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Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 15-16: जो भगवान के विविध रूप की पूजा करते है क्या उनसे कृष्ण खुश होते है ? जानें

जीवांजलि धर्म डेस्क Published by: निधि Updated Wed, 26 Jun 2024 05:31 PM IST
सार

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 15-16: भगवद्गीता के इस लेख में हम आपको बताते है की आगे क्या हुआ, महात्मा सदैव भगवान् कृष्ण के गुणों का कीर्तन करता रहता है।

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 15-16:
Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 15-16:- फोटो : jeevanjali

विस्तार

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 15-16: भगवद्गीता के इस लेख में हम आपको बताते है की आगे क्या हुआ, महात्मा सदैव भगवान् कृष्ण के गुणों का कीर्तन करता रहता है। वह अपने स्वामी कृष्ण और राधा के नाम का कीर्तन करता है। इसके आगे भगवान् कहते है -
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भगवत गीता अध्याय 9 श्लोक 15 - Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 15 

ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते। एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् 

ज्ञान-यज्ञेन–ज्ञान पोषित करने के लिए यज्ञ करना; च-और; अपि-भी; अन्ये-अन्य लोग; यजन्तः-यज्ञ करते हुए; माम्-मुझको; उपासते-पूजते हैं; एकत्वेन एकान्त भाव से; पृथक्त्वेन–अलग से; बहुधा अनेक प्रकार से; विश्वतः-मुखम् ब्रह्माण्डीय रूप में।


अर्थ - अन्य लोग जो ज्ञान के अनुशीलन द्वारा यज्ञ में लगे रहते हैं, वे भगवान् की पूजा उनके अद्वय रूप में, विविध रूपों में तथा विश्र्व रूप में करते हैं। 
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व्याख्या - पिछले श्लोक में कृष्ण ने कहा कि कुछ महात्मा बुद्धि के मनुष्य सिर्फ मेरी पूजा करते है और मेरे नाम का ही स्मरण करते है। इस श्लोक में अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए वो कहते है, मनुष्य अपनी अपनी भावनानुसार ईश्वर के एक या दूसरे रूपों या गुणों की भिन्न भिन्न उपासना पद्धति का प्रयोग करते हुए उपासना करते हैं। इनमें से कुछ का वर्णन आर्त, अर्थार्थी, ज्ञानी तथा जिज्ञासु के रूप में किया जा चुका है। श्रीकृष्ण कहते हैं कि ऐसे ज्ञानी योगी भी उसकी आराधना करते हैं लेकिन उनके सर्वत्र व्यापक निराकार रूप की। यह ब्रह्माण्ड भी भगवान् का एक स्वरूप है इसलिए इसे भी संतों ने अनुचित नहीं माना है।  

भगवत गीता अध्याय 9 श्लोक 16 - Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 16

अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम्। मन्त्रोऽहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्

अहम्-मैं; क्रतुः-वैदिक कर्मकाण्ड; अहम्-मैं; यज्ञः-समस्त यज्ञ; स्वधा-तर्पण; अहम्–मैं; औषधाम्-जड़ी-बूटी; मन्त्र-वैदिक मंत्र; अहम्-मैं; एव–निश्चय ही; आश्यम्-घी। 


अर्थ - मैं ही कर्मकाण्ड, मैं ही यज्ञ, पितरों को दिया जाने वाला अर्पण, औषधि, दिव्य ध्वनि (मन्त्र), घी, अग्नि तथा आहुति हूँ। 

व्याख्या - यहां श्री कृष्ण अपनी शक्तियों के बारे में बता रहे है या इसे ऐसे भी समझ सकते है कि जो भी कर्म कांड मनुष्य के द्वारा संपन्न किया जाता है वो अंत में कृष्ण को ही प्राप्त हो जाता है। श्री कृष्ण ने स्पस्ट किया कि यज्ञ में प्रयुक्त होने वाले स्वधा , औषधि,मंत्र और अग्नि स्वयं श्री कृष्ण ही हैं। यज्ञ में प्रयुक्त होने मन्त्रों के स्तोत्र वेद और ओम् वह स्वयं हैं। इसके साथ ही यज्ञ भी वह स्वयं है। अतः श्री कृष्ण स्वयं हर वस्तु और हर दिशा में स्वयं ही है।
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