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Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 13-14: क्या एक साधारण मनुष्य भी बन सकता है महात्मा ! जानिए कैसे ?

जीवांजलि धर्म डेस्क Published by: निधि Updated Mon, 24 Jun 2024 06:21 PM IST
सार

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 13-14: भगवद्गीता के इस लेख में आगे क्या हुआ चलिए जानते है, जो मनुष्य मोहग्रस्त होते हैं, वे आसुरी तथा नास्तिक विचारों के हो जाते है।

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 13-14
Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 13-14- फोटो : jeevanjali

विस्तार

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 13-14: भगवद्गीता के इस लेख में आगे क्या हुआ चलिए जानते है, जो मनुष्य मोहग्रस्त होते हैं, वे आसुरी तथा नास्तिक विचारों के हो जाते है। इसके बाद श्री कृष्ण बोले -
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भगवत गीता अध्याय 9 श्लोक 13 - Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 13 

महात्मानस्तु मां पार्थ दैवी प्रकृतिमाश्रिताः। भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्

महा-आत्मनः-महान जीवात्माएँ तु-लेकिन; माम्-मुझको; पार्थ-पृथापुत्र, अर्जुन; दैवीम्-प्रकृतिम्-दिव्य शक्ति; आश्रिताः-शरणग्रहण करना; भजन्ति-भक्ति में लीन; अनन्य-मनसः-अविचलित मन से; ज्ञात्वा-जानकर; भूत-समस्त सृष्टि; आदिम्-उदगम; अव्ययम्-अविनाशी।


अर्थ - महान आत्माएँ जो मेरी दिव्य शक्ति का आश्रय लेती हैं, वे मुझे समस्त सृष्टि के उद्गम के रूप में जान लेती हैं। सज्जन मनुष्य मेरी निरंतर भक्ति करते हुए मेरी दैवीय प्रकृति में आश्रित होते हैं। 
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व्याख्या - इसके पिछले श्लोक में श्री कृष्ण ने कहा है कि जो मोह और संदेह करते है उन्हें आसुरी शक्ति अपने प्रभाव में ले सकती है। अब इसी बात को आगे बढ़ाते हुए कृष्ण कहते है कि कुछ ऐसी महान जीवात्मा होती है जो सिर्फ मेरी शक्ति का ही आश्रय लेती है। वो मेरे उस अविनाशी स्वरुप को समझ जाते है जो कि इस संसार के सृजन और विनष्ट होने का कारण है। इसलिए उनको कृष्ण सज्जन कहते है। ऐसे मनुष्य श्री कृष्ण की दैवीय प्रकृति को प्राप्त होते हैं। ऐसी पुण्य आत्माएँ जो भगवान की दिव्य कृपा प्राप्त कर लेती हैं, वे दिव्य प्रेम से युक्त होकर भगवान की अविरल भक्ति में तल्लीन रहती हैं। 

भगवत गीता अध्याय 9 श्लोक 14 - Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 14 

सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः। नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते 

सततम् सदैव; कीर्तयन्तः-दिव्य महिमा का गान; माम्-मेरी; यतन्तः-प्रयास करते हुए; च-भी; दृढ-व्रताः-दृढ़ संकल्प से; नमस्यन्तः-नतमस्तक होकर; च-तथा; माम्-मुझको; भक्त्या-भक्ति में; नित्य-युक्ताः -निरंतर मेरे ध्यान में युक्त होकर; उपासते-पूजा करते हैं।


अर्थ - ये महात्मा मेरी महिमा का नित्य कीर्तन करते हुए दृढसंकल्प के साथ प्रयास करते हुए, मुझे नमस्कार करते हुए, भक्तिभाव से निरन्तर मेरी पूजा करते हैं। 

व्याख्या - एक साधारण इंसान कैसे महात्मा बन जाता है? ये कैसे संभव होता है ? यहां श्री कृष्ण उसके लक्षण समझा रहे है। महात्मा सदैव भगवान् कृष्ण के गुणों का कीर्तन करता रहता है। वह अपने स्वामी कृष्ण और राधा के नाम का कीर्तन करता है। एक साधारण मनुष्य को चाहिए कि वह जितना हो सके भगवान् के दिव्य नाम, गुणों और उनकी लीलाओं का वर्णन करे। ईश्वर की सेवा करें। कृष्ण समझा रहे है कि उनकी भक्ति करना कोई कठिन कार्य नहीं है। किसी बेहे साधु, महात्मा के आशीर्वाद से एक साधारण व्यक्ति भी संसार में रहते हुए महात्मा का पद प्राप्त कर सकता है।
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