विज्ञापन
Home  mythology  bhagwat katha  bhagwat geeta chapter 9 verse 11 12 what happens to those who mock god listen to krishna answer

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 11-12: जो ईश्वर का या कृष्ण का उपहास करते है उनके साथ क्या होता है? सुनिए कृष्ण

जीवांजलि धर्म डेस्क Published by: निधि Updated Sat, 22 Jun 2024 06:10 PM IST
सार

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 11-12: भगवद्गीता के इस लेख में हम आपको बताते है की आगे क्या हुआ, यह प्राकृत शक्ति कृष्ण की आज्ञा से चर और अचर प्राणियों को उत्पन्न करती है।

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 11-12
Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 11-12- फोटो : jeevanjali

विस्तार

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 11-12: भगवद्गीता के इस लेख में हम आपको बताते है की आगे क्या हुआ, यह प्राकृत शक्ति कृष्ण की आज्ञा से चर और अचर प्राणियों को उत्पन्न करती है। इसी कारण यह जगत् बारम्बार सृजित और विनष्ट होता रहता है। इसके बाद कृष्ण ने कहा, 
विज्ञापन
विज्ञापन

भगवत गीता अध्याय 9 श्लोक 11 - Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 11 

अवजानन्ति मां मूढ़ा मानुषीं तनुमाश्रितम्। परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्

अवजानन्ति-उपेक्षा करते हैं; माम्-मुझको; मूढाः-अल्प ज्ञानी; मानुषीम्-मनुष्य रूप में; तनुम्–शरीर; आश्रितम्-मानते हुए; परम्-दिव्य; भावम्-व्यक्तित्व को; अजानन्तः-न जानते हुए; मम–मेरा; भूत-प्रत्येक जीव का; महा-ईश्वरम्-परमेश्वर।


अर्थ - जब मैं मनुष्य रूप में अवतरित होता हूँ, तो मूर्ख मेरा उपहास करते हैं। वे मुझ परमेश्र्वर के दिव्य स्वभाव को नहीं जानते। 

व्याख्या - भगवान् श्री कृष्ण ने पुछले कुछ श्लोकों में जिन कार्यों का वर्णन किया है वो किसी साधारण इंसान के द्वारा तो नहीं किया जा सकते है ,एक व्यक्ति इस पूरे संसार को कैसे चला सकता है ! इसलिए कृष्ण कहते है कि कुछ छोटी बुद्धि वाले लोग मेरा उपहास करते है। यही कारण है कि हर युग में भगवान श्री कृष्ण किसी न किसी रूप में मनुष्यों के सामने प्रकट होते हैं और कृष्ण कहते है कि वो लोग मेरे स्वाभाव और मेरी शक्ति को नहीं जानते है। 
विज्ञापन


ईश्वर जब मनुष्य के रूप में अवतार लेते है तो कई बार लोग उन्हें पहचान नहीं पाते है। राम और कृष्ण अवतार में हमने देखा है कि ईश्वर को अपमान भी भोगना पड़ा और उन्होंने संघर्ष भी किया। जरासंध कृष्ण का खूब अपमान करता था वही रावण तो राम जी को वनवासी कहता था। इसलिए कृष्ण कहते है कि माया के प्रभाव से ऐसा होना संभव है। 

भगवत गीता अध्याय 9 श्लोक 12 - Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 12 

मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः। राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिता

मोघ-आशाः – निष्फल आशा; मोघ-कर्माणः – निष्फल सकाम कर्म; मोघ-ज्ञानाः – विफल ज्ञान; विचेतसः – मोहग्रस्त; राक्षसीम् – राक्षसी; आसुरीम् – आसुरी; च – तथा; एव – निश्चय ही; प्रकृतिम् – स्वभाव को; मोहिनीम् – मोहने वाली; श्रिताः – शरण ग्रहण किये हुए। 


अर्थ - जो लोग इस प्रकार मोहग्रस्त होते हैं, वे आसुरी तथा नास्तिक विचारों के हो जाते है। उनके मुक्ति-आशा, उनके सकाम कर्म तथा ज्ञान का अनुशीलन सभी निष्फल हो जाते है। 

व्याख्या - इस श्लोक में श्री कृष्ण पिछले श्लोक की बात को आगे बढ़ा रहे हैं। वो कहते है, अगर किसी मनुष्य की बुद्धि संहेद में है या उसका मन एकाग्र नहीं है तो वो फिर अच्छे लोगों का संग नहीं कर सकता। आसुरी विचार वाले लोग उसकी बुद्धि को मोहित कर सकते है और एक समय के बाद वो हो सकता है कि ईश्वर को ही नकार दे। ऐसे आसुरी दुष्ट कभी भी कृष्ण की शरण में नहीं जाते। इसलिए मनुष्य को हमेशा अच्छे लोगों का संग ही करना चाहिए और जैसा की कृष्ण कहते है कि श्रद्धा मोक्ष का पहला द्वार है इसे कभी भी नहीं भूलना चाहिए।
विज्ञापन