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Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 5-6: ब्रह्मांड के सभी प्राणी भगवान में कैसे स्थिर रहते हैं? श्री कृष्ण से जानें

जीवांजलि Published by: निधि Updated Wed, 19 Jun 2024 10:00 AM IST
सार

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 5-6: भगवद्गीता के इस लेख में हम आपको बताते है की संसार में परमात्मा और परमात्मा में संसार निवास करता है लेकिन उसके बाद भी परमात्मा का नाश नहीं होता है।

Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 5-6: भगवद्गीता
Bhagavad Gita Chapter 9 Verse 5-6: भगवद्गीता- फोटो : jeevanjali

विस्तार

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 5-6: भगवद्गीता के इस लेख में हम आपको बताते है की संसार में परमात्मा और परमात्मा में संसार निवास करता है लेकिन उसके बाद भी परमात्मा का नाश नहीं होता है। आगे भगवान् कहते है,
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भगवत गीता अध्याय 9 श्लोक 5 - Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 5

न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम्। भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावन 

न–कभी नहीं; च-और; मत्-स्थानि–मुझमें स्थित; भूतानि–सभी जीव; पश्य-देखो; मे–मेरा; योगम् ऐश्वरम्-दिव्य शक्ति; भूत-भृत्-जीवों का निर्वाहक; न-नहीं; च-भी; भूतस्थ:-में रहते हैं; मम–मेरा; आत्मा-स्वयं; भूत-भावन-सभी जीवों का सर्जक;


अर्थ - मेरी ईश्वरीय योगशक्ति को देखो कि जीवों का धारण-पोषण करने वाला और जीवों को उत्पन्न करने वाली भी मेरा आत्मा वास्तव में जीवों में स्थित नहीं है।  मैं उनसे या प्राकृतिक शक्ति से प्रभावित नहीं होता।
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व्याख्या - हम सब इस बात को जानते है कि ईश्वर हमारे ह्रदय में निवास करता है उसके बाद भी हमें उसका बोध नहीं होता है। दरअसल भगवान् की शक्ति योगमाया हमे संसार में उलझा देती है। योगमाया बेहद शक्तिशाली है लेकिन उसके बाद भी ईश्वर उससे अलग है। जब इस संसार का नाश हो जाता है उसके बाद भी ईश्वर के दिव्य स्वरुप का नाश नहीं होता यानी कि वो प्रकृति से प्रभावित नहीं हो सकते है। 

भगवत गीता अध्याय 9 श्लोक 6 - Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 6

यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान्। तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय

यथा-जैसे; आकाश-स्थितः-आकाश में स्थित; नित्यम्-सदैव; वायुः-हवा; सर्वत्र-ग:-सभी जगह प्रवाहित होने वाली; महान शक्तिशाली; तथा उसी प्रकार; सर्वाणि भूतानि सारे प्राणी; मत्स्थानि–मुझमें स्थित; इति–इस प्रकार; उपधारय-जानो।

  
अर्थ -  जिस प्रकार प्रबल वायु प्रत्येक स्थान पर प्रवाहित होती है और आकाश में जाकर स्थित हो जाती है वैसे ही सभी जीव सदैव मुझमें स्थित रहते हैं। 

व्याख्या - कई बार एक प्राणी के मन में यह प्रश्न आ सकता है कि यह संसार कैसे कृष्ण में स्थित हो सकता है ? इसे समझाने के लिए श्री कृष्ण एक उदाहरण देते है। वो समझाते है की वायु हर स्थान पर प्रवाहित होती है और आकाश में स्थित होती है लेकिन उससे अलग नहीं हो सकती है। इसी प्रकार जितनी भी जीवात्मा है उन सबका सम्बन्ध श्री कृष्ण से है। वो सब अपना अपना कर्म करते हुए अंत में श्री भगवान् को ही प्राप्त होती है। इसलिए सब कुछ भगवान में ही स्थित है।

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