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Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 3 - 4: ईश्वर को कैसे करें प्राप्त? सिर्फ एक छोटे से उपाय से मिल जाते है भगवान!

जीवांजलि Published by: निधि Updated Mon, 17 Jun 2024 03:15 PM IST
सार

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 3 - 4: भगवद्गीता के इस लेख में  हम आपको बताते है कि, राज विद्या उच्च कोटि की विद्या है, अति गोपनीय, पवित्र करने वाला और उत्तम ज्ञान है।

Bhagavad Gita Chapter 9, Verse 3, 4
Bhagavad Gita Chapter 9, Verse 3, 4- फोटो : jeevanjali

विस्तार

Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 3 - 4: भगवद्गीता के इस लेख में  हम आपको बताते है कि, राज विद्या उच्च कोटि की विद्या है, अति गोपनीय, पवित्र करने वाला और उत्तम ज्ञान है। इसके बाद भगवान् कृष्ण अर्जुन से कहते है, 
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भगवत गीता अध्याय 9 श्लोक 3 - Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 3

अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप। अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि

अश्रद्दधानाः-श्रद्धाविहीन लोग; पुरुषा:-व्यक्ति; धर्मस्य-धर्म के प्रति; अस्य-इस; परन्तप-शत्रु विजेता, अर्जुन; अप्राप्य–बिना प्राप्त किये; माम्-मुझको; निवर्तन्ते-लौटते हैं; मृत्युः-मृत्युः संसार–भौतिक संसार में; वर्त्मनि-मार्ग में।


अर्थ - वे लोग जो इस धर्म में श्रद्धा नहीं रखते वे मुझे प्राप्त नहीं कर सकते। वे जन्म-मृत्यु के मार्ग पर बार-बार इस संसार में लौटकर आते रहते हैं। 
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व्याख्या - इस श्लोक में भगवान् श्री कृष्ण कहते है कि अगर ईश्वर को प्राप्त करना है तो ईश्वर को विश्वास और श्रद्धा रखनी पड़ती है। आप कितने ही कर्म कांड कर ले या कितने ही यज्ञ और हवन कर ले लेकिन जिस व्यक्ति की आस्था बलवान नहीं है वो कभी भी कृष्ण को प्राप्त नहीं कर सकता है। इस श्लोक के माध्यम से कृष्ण एक चीज को स्पष्ट करते है कि ईश्वर को पाने की पहली शर्त ही श्रद्धा है। जो ऐसा नहीं करते है वो जन्म-मृत्यु के मार्ग पर बार-बार इस संसार में लौटकर आते रहते हैं। 

भगवत गीता अध्याय 9 श्लोक 4 - Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 4

मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना। मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थित

मया मेरे द्वारा; ततम्-व्याप्त है; इदम् यह; सर्वम् समस्त; जगत्-ब्रह्माण्डीय अभिव्यक्तियाँ; अव्यक्त-मूर्तिना-अव्यक्त रूप द्वारा; मत्-स्थानि–मुझमें; सर्व-भूतानि-समस्त जीवों में ; न-नहीं; च-भी; अहम्-मैं; तेषु-उनमें; अवस्थितः-निवास।


अर्थ - मुझ निराकार परमात्मा से यह सब जगत् परिपूर्ण है और सब जीव मेरे अंतर्गत संकल्प के आधार स्थित हैं, किंतु वास्तव में मैं उनमें स्थित नहीं हूँ। 

व्याख्या - इस श्लोक में कृष्ण कहते है कि वो सर्व व्यापक है। यानी कि वो साकार और निराकार दोनों रूप में है। सम्पूर्ण संसार अर्थात् कृष्ण की परा और अपरा प्रकृति कृष्ण में ही स्थित है। यहां एक समय के बाद संसार का नाश होता है लेकिन कृष्ण का नाश नहीं होता। संसार में परमात्मा और परमात्मा में संसार निवास करता है लेकिन उसके बाद भी परमात्मा का नाश नहीं होता है। एक जीवात्मा भले ही ईश्वर का अंश हो सकती है लेकिन वो ईश्वर के समान कभी नहीं हो सकती है। जैसे मिट्टी का बर्तन। वो बनता मिट्टी से है लेकिन बर्तन नष्ट होने पर मिट्टी का नाश नहीं होता।
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