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Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 1 - 2: भगवान कृष्ण ने अर्जुन को कौन सा ज्ञान देने का वचन दिया? समझिए महत्व

जीवांजलि धर्म डेस्क Published by: निधि Updated Thu, 13 Jun 2024 06:32 PM IST
सार

 Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 1 - 2: श्री कृष्ण अर्जुन की प्रशंसा करते है ,वो इस बात को स्पष्ट करते है कि अर्जुन की उनके ऊपर असीम श्रद्धा है। वो बाकी मनुष्यों की तरह नहीं है कि कृष्ण और उनके ज्ञान को हंसकर टाल दे।

Bhagavad Gita
Bhagavad Gita- फोटो : jeevanjali

विस्तार

 Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 1 - 2: भगवद्गीता के लेख में आज हम आपको बताएंगे कि जो योगी भक्ति के मार्ग पर चलता है वो वेदाध्ययन, तपस्या, यज्ञों के अनुष्ठान और दान से प्राप्त होने वाले फलों से कभी वंचित नहीं होता। यहां गीता के अष्टम अध्याय का समापन हो जाता है। इसके बाद नवें अध्याय की शुरुआत होती है। 
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भगवत गीता अध्याय 9 श्लोक 1 - Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 1

इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे। ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात्  

 श्रीभगवान्-उवाच-परम प्रभु ने कहा; इदम्-इस; तु–लेकिन; ते-तुमको; गुह्य-तमम् अत्यन्त गूढ़ प्रवक्ष्यामि मैं प्रदान करूँगा अनसूयवे-ईर्ष्या न करने वाला; ज्ञानम्-ज्ञान; विज्ञान-अनुभूत ज्ञान; सहितम्-सहित; यत्-जिसे; ज्ञात्वा-जानकर; मोक्ष्यसे मुक्त हो सकोगे; अशुभात्– भौतिक संसार के कष्ट।


अर्थ -  हे अर्जुन ! क्योंकि तुम मुझ पर विश्वास करते हो इसलिए मैं तुम्हें विज्ञान सहित परम गुह्म ज्ञान बताऊँगा जिसे जानकर तुम भौतिक जगत के कष्टों से मुक्त हो जाओगे। 
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व्याख्या - इस श्लोक के माध्यम से श्री कृष्ण अर्जुन की प्रशंसा करते है ,वो इस बात को स्पष्ट करते है कि अर्जुन की उनके ऊपर असीम श्रद्धा है। वो बाकी मनुष्यों की तरह नहीं है कि कृष्ण और उनके ज्ञान को हंसकर टाल दे। इसलिए अब कृष्ण को विज्ञान सहित परम गुह्म ज्ञान समझाने वाले है जो कि इस संसार के सभी कष्टों से मुक्त कर देता है। 

भगवत गीता अध्याय 9 श्लोक 2 - Bhagwat Geeta Chapter 9 Verse 2

राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम्। प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् 

राज-विद्या-विद्याओं का राजा; राज-गुह्यम्-अत्यन्त गहन रहस्य का राजा; पवित्रम्-शुद्ध; इदम् यह; उत्तमम्-सर्वोच्च; प्रत्यक्ष–प्रत्यक्ष; अवगमम्-प्रत्यक्ष समझा जाने वाला; धर्म्यम्-धर्म युक्त; सु-सुखम् अत्यन्त सरल; कर्तुम् अभ्यास करने में; अव्ययम्-अविनाशी।


अर्थ - यह राज विद्या उच्च कोटि की विद्या है, अति गोपनीय, पवित्र करने वाला और उत्तम ज्ञान है। यह वास्तविक अनुभव से प्राप्त होने वाला, सरल और धर्म के अनुकूल है। 

व्याख्या - श्री कृष्ण यहां समझाते है कि यह राज विद्या है। यानी कि जो शासन करता है उसके लिए बेहद ज़रूरी है। चूंकि अर्जुन को अपने राज्य को संभालना था इसलिए कृष्ण उसे यह ज्ञान देना ज़रूरी समझते है। कृष्ण कहते है कि ये अति गोपनीय है। इसके पीछे यह भी कारण हो सकता है कि ईश्वर को हम देख नहीं  सकते क्योंकि उसकी ऊर्जा असीमित है। इसलिए हमारे पास भक्ति का मार्ग है। 

ईश्वर कहते है कि मैं तुम्हारी आत्मा में ही विराजमान हूं इसलिए अपनी आत्मा के विज्ञान को समझो। आगे कृष्ण इसे पवित्र और उत्तम भी कहते है। दरअसल यहां किसी भी प्रकार की भौतिक सुख की इच्छा और वासना नहीं है इसलिए ये दिव्य प्रेम से युक्त ज्ञान है। यह वेद और धर्म के अनुकूल भी है।
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