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Bhagwat Geeta Chapter 8 Verse 27 - 28: यज्ञ, दान और तप का फल कैसे बढ़ाया जा सकता है ? कृष्ण ने अर्जुन को समझ

जीवांजलि धर्म डेस्क Published by: निधि Updated Wed, 12 Jun 2024 06:17 PM IST
सार

Bhagwat Geeta Chapter 8 Verse 27 - 28: प्रकाश का मार्ग मुक्ति की ओर तथा अंधकार का मार्ग पुनर्जन्म की ओर ले जाता है। इसके बाद श्री कृष्ण ने कहा, 
 

Bhagavad Gita
Bhagavad Gita- फोटो : jeevanjali

विस्तार

Bhagwat Geeta Chapter 8 Verse 27 - 28: भगवद्गीता के पिछले लेख में आपने पढ़ा कि, प्रकाश और अंधकार के दोनों पक्ष संसार में सदा विद्यमान रहते हैं। प्रकाश का मार्ग मुक्ति की ओर तथा अंधकार का मार्ग पुनर्जन्म की ओर ले जाता है। इसके बाद श्री कृष्ण ने कहा, 
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भगवत गीता अध्याय 8 श्लोक 27 - Bhagwat Geeta Chapter 8 Verse 27

नैते सृती पार्थ जानन्योगी मुह्यति कश्चन। तस्मात्सर्वेषु कालेषु योगयुक्तो भवार्जुन 

न कभी नहीं; एते इन दोनों; सृती-मार्गः पार्थ-पृथापुत्र, अर्जुन; जानन्-जानते हुए भी; योगी-योगी; मुह्यति–मोहग्रस्त; कश्चन-कोई; तस्मात्-अतः; सर्वेषु-कालेषु-सदैव; योग-युक्तः योग में स्थित; भव-होना; अर्जुन–हे अर्जुन।


अर्थ - अर्जुन, भक्तगण इन दोनों मार्गों को जानते और समझते है किंतु वे मोहग्रस्त नहीं होते। इसलिए तुम भक्ति में ही सदैव स्थिर रहना सीखो। 
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व्याख्या - पिछले श्लोकों में भगवान् श्री कृष्ण ने अन्धकार और प्रकाश का मार्ग समझाया है। अब उसी बात को आगे बढ़ाते हुए वो कहते है कि भक्त इन दोनों मार्गों को समझता है। यानी कि एक मार्ग वो है जो परम आनंद और ईश्वर में लीन हो जाने का मार्ग है और एक मार्ग वो है जहां एक समय के बाद वापिस इस मृत्यु लोक में आना ही पड़ता है। कृष्ण कहते है कि शुद्ध बुद्धि की आत्मा किसी भी प्रकार से मोह ग्रस्त नहीं होती। इसलिए वो सदैव भक्तियोग में ही स्थिर रहता है। 

भगवत गीता अध्याय 8 श्लोक 28 - Bhagwat Geeta Chapter 8 Verse 28

वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम्। अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम्

वेदेष वेदो के अध्ययन में; यज्ञेषु यज्ञ का अनुष्ठान करने में; तपःसु तपस्याएँ करने में; च-भी; एव-निश्चय ही; दानेषु-दान देने में; यत्-जो; पुण्य-सफलम्-पुण्यकर्म का फल; प्रदिष्टम् प्राप्त करना; अत्येति-पार कर जाता है; तत्-सर्वम्-वे सब; इदम् यह; विदित्वा-जानकर; योगी-योगी; परम-परम; स्थानम्-धाम को; उपैति-प्राप्त करता है; च-भी; आद्यम्-सनातन, आदि।


अर्थ - जो योगी भक्ति के मार्ग पर चलता है वो वेदाध्ययन, तपस्या, यज्ञों के अनुष्ठान और दान से प्राप्त होने वाले फलों से कभी वंचित नहीं होता। वह सिर्फ भक्ति के माध्यम से ही इन फलों की प्राप्त कर लेता है और परम धाम को प्राप्त हो जाता है। 

व्याख्या - हम  तपस्या, यज्ञों के अनुष्ठान और दान क्यों करते है ? हम ऐसा इसलिए करते है क्योंकि यह पद्धतियां हमें ईश्वर की कृपा प्राप्त करने में मदद करती है। लेकिन अष्टम अध्याय के उपसंहार में श्री कृष्ण कहते है कि इनके द्वारा जो फल प्राप्त होता है वो सिर्फ भक्ति के मार्ग पर चलकर भी प्राप्त किया जा सकता है। अगर कोई जीवात्मा भक्ति के मार्ग का अनुसरण कर ले तो वो इन सब फलों को सिर्फ भक्ति के मार्ग से प्राप्त करके परम धाम को प्राप्त हो जाता है।
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