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Kamakhya Devi Temple: कामाख्या देवी मंदिर में 3 दिन क्यों नहीं होती है पुरुषों की एंट्री, जानें क्या है वजह?

JeevanjaliPublished by:
नीरज पटेल
सार

Kamakhya Mandir: कामाख्या मंदिर हर साल तीन दिनों के लिए बंद रहता है, और इस दौरान यहां एक विशेष उत्सव मनाया जाता है जिसे अंबुबाची मेला कहते हैं। यह माना जाता है कि इन तीन दिनों में देवी कामाख्या रजस्वला होती हैं, यानी उन्हें मासिक धर्म होता है। इस दौरान, मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं।

कामाख्या देवी मंदिर में 3 दिन क्यों नहीं होती है पुरुषों की एंट्री, जानें क्या है वजह?
Kamakhya Devi Mandir Importance: कामाख्या देवी मंदिर भारत के सबसे प्रसिद्ध और महत्वपूर्ण शक्तिपीठों में से एक है। यह असम की राजधानी दिसपुर के पास, गुवाहाटी शहर में नीलाचल पर्वत पर स्थित है। यह मंदिर अपनी अनूठी मान्यताओं, रहस्यों और तांत्रिक महत्व के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। यहां की सबसे खास बात यह है कि इस मंदिर में देवी की कोई मूर्ति नहीं है, बल्कि योनि की पूजा की जाती है। यह मंदिर हर साल तीन दिनों के लिए बंद रहता है, और इस दौरान पुरुषों का प्रवेश वर्जित होता है। इसके पीछे की वजह एक विशेष धार्मिक मान्यता से जुड़ी है।

पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से देवी सती के शरीर के 51 टुकड़े किए, तो उनकी योनि इसी स्थान पर गिरी थी। यही कारण है कि यह 51 शक्तिपीठों में से एक है और इसे 'योनि-स्थान' के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यहां देवी की कोई मूर्ति नहीं है। इसके बजाय, गर्भगृह में एक प्राकृतिक चट्टान से बनी योनि की आकृति की पूजा की जाती है। इस चट्टान से लगातार पानी का रिसाव होता रहता है, जिसे बहुत ही पवित्र माना जाता है।

अंबुबाची मेला और रजस्वला की मान्यता

देवी का मासिक धर्म

यह माना जाता है कि हर साल जून के महीने में देवी कामाख्या रजस्वला होती हैं, यानी उन्हें मासिक धर्म होता है। इस समय को अंबुबाची पर्व या अंबुबाची मेला के रूप में मनाया जाता है। यह पर्व तीन से चार दिनों तक चलता है, और इस दौरान मंदिर के कपाट बंद रहते हैं।

स्त्री शक्ति का सम्मान

यह मान्यता स्त्रीत्व, सृजन और प्रकृति के प्रति सम्मान का प्रतीक है। मासिक धर्म को किसी भी तरह से अपवित्र नहीं माना जाता, बल्कि इसे जीवन और नई सृष्टि के सृजन का उत्सव माना जाता है। इस समय को देवी के विश्राम का समय भी माना जाता है, इसलिए किसी भी तरह की पूजा-अर्चना नहीं की जाती है।

पुरोहितों का प्रवेश वर्जित

इन तीन दिनों के दौरान, मंदिर के मुख्य पुजारी (जो आमतौर पर पुरुष होते हैं) उनका भी मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश नहीं वर्जित रहता है। यह परंपरा इस बात का प्रतीक है कि स्त्री शक्ति के इस विशेष समय का सम्मान किया जाए।

ब्रह्मपुत्र नदी का लाल होना

कहा जाता है कि इस दौरान कामाख्या मंदिर के पास बहने वाली ब्रह्मपुत्र नदी का पानी भी लाल हो जाता है। भक्तों का मानना है कि यह लाल रंग देवी के मासिक धर्म का प्रतीक है।

तीन दिनों की प्रक्रिया

अंबुबाची पर्व के पहले दिन, मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं। इन तीन दिनों में मंदिर के गर्भगृह में एक सफेद रंग का कपड़ा रखा जाता है। मान्यता है कि चौथे दिन जब कपाट खोले जाते हैं, तो वह कपड़ा लाल रंग का हो जाता है। चौथे दिन, देवी को शुद्धिकरण स्नान कराने के बाद मंदिर के कपाट भक्तों के लिए खोल दिए जाते हैं। यही लाल रंग का कपड़ा प्रसाद के रूप में भक्तों को दिया जाता है, जिसे अंबुबाची वस्त्र कहा जाता है। इस प्रसाद को बहुत ही शुभ और शक्तिशाली माना जाता है। 

तांत्रिकों का गढ़

कामाख्या मंदिर तंत्र-मंत्र और अघोर साधना का एक महत्वपूर्ण केंद्र है। यहां तांत्रिक अपनी सिद्धियां प्राप्त करने के लिए आते हैं। यह माना जाता है कि इस मंदिर में की गई साधना से भक्तों को विशेष शक्तियां और मनोकामनाएं पूरी करने का वरदान मिलता है। यह परंपरा न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि यह एक ऐसा उत्सव है जो स्त्री शक्ति और प्रकृति की सृजनात्मकता का सम्मान करता है।

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