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Lord Ganesh: भगवान गणेश को क्यों कहा जाता है अष्टविनायक? जानें इसका रहस्य

JeevanjaliPublished by:
नीरज पटेल
सार

Asht Vinayaka: हिन्दू धर्म में भगवान गणेश को अष्टविनायक के नाम से भी जाना जाता है, लेकिन क्या आपको पता है कि भगवान गणेश अष्टविनायक क्यों कहलाएं और इसके पीछे का रहस्य क्या है। आइए जानते हैं...

भगवान गणेश को क्यों कहा जाता है अष्टविनायक? जानें इसका रहस्य
Asht Vinayaka Importance: हिन्दू धर्म में भगवान गणेश को 'अष्टविनायक' इसलिए कहा जाता है क्योंकि 'अष्टविनायक' का शाब्दिक अर्थ आठ गणेश होता है। यह नाम महाराष्ट्र में स्थित भगवान गणेश के आठ स्वयंभू (स्वयं प्रकट) मंदिरों के समूह को दिया गया है। ये मंदिर अपनी अलग-अलग पौराणिक कथाओं, मूर्तियों के स्वरूप और महत्व के कारण विशेष माने जाते हैं।

अष्टविनायक का रहस्य

अष्टविनायक के पीछे का रहस्य इन आठ मंदिरों से जुड़ी कहानियों में छिपा है, जहां भगवान गणेश ने अलग-अलग अवतार लेकर अपने भक्तों की रक्षा की और राक्षसों का संहार किया। हर मंदिर की अपनी एक अनोखी कहानी है जो भगवान गणेश के विभिन्न स्वरूपों और उनकी शक्तियों को दर्शाती है। ये आठ मंदिर और उनसे जुड़ी कुछ प्रमुख बातें इस प्रकार हैं।


मोरेश्वर (मोरगांव): इस मंदिर में भगवान गणेश ने मोर पर सवार होकर सिंधुरासुर नामक राक्षस का वध किया था, इसीलिए उन्हें मयूरेश्वर भी कहा जाता है।

सिद्धिविनायक (सिद्धटेक): यह मंदिर इसलिए खास है क्योंकि यहां भगवान विष्णु ने गणेश जी की पूजा करके सिद्धि प्राप्त की थी।

बल्लालेश्वर (पाली): यह एकमात्र ऐसा मंदिर है जिसका नाम गणेश जी के एक भक्त बल्लाल के नाम पर रखा गया है, जिनकी भक्ति से प्रसन्न होकर गणेश जी ने यहां वास किया।

वरदविनायक (महाड): इस मंदिर में भगवान गणेश भक्तों की सभी कामनाओं को पूरा करने का वरदान देते हैं। यहां की मूर्ति एक कुंड में मिली थी।

चिंतामणि (थेऊर): इस स्थान पर भगवान गणेश ने राजा चिंतामणि के मन को शांत किया था और एक चोर से मणि वापस दिलाई थी।

गिरिजात्मज (लेन्याद्री): यह मंदिर एक गुफा में स्थित है। 'गिरिजात्मज' का अर्थ है 'गिरिजा (पार्वती) के पुत्र', क्योंकि माता पार्वती ने यहीं पर गणेश जी को पुत्र रूप में पाने के लिए तपस्या की थी।

विघ्नेश्वर (ओझर): यहां भगवान गणेश ने विघ्नासुर नामक राक्षस का वध किया था, जिसने सभी धार्मिक कार्यों में बाधा डालना शुरू कर दिया था।

महागणपति (रांजनगांव): इस स्थान पर भगवान शिव ने त्रिपुरासुर का वध करने से पहले भगवान गणेश की पूजा की थी, जिससे उन्हें महागणपति के रूप में जाना जाने लगा।

यात्रा का महत्व

इन आठ मंदिरों की यात्रा को अष्टविनायक तीर्थयात्रा कहा जाता है, जिसे बहुत ही शुभ माना जाता है। मान्यता है कि यह यात्रा एक विशेष क्रम में करनी चाहिए और पूरी होने पर वापस पहले मंदिर (मोरगांव) में आकर दर्शन करने चाहिए। ऐसा करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं और जीवन में आने वाली सभी बाधाएं दूर हो जाती हैं।

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