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Pauranik Katha: भगवान कार्तिकेय ने मोर को ही क्यों बनाया अपना वाहन, जानें धार्मिक मान्यता

JeevanjaliPublished by:
नीरज पटेल
सार

भगवान कार्तिकेय ने मोर को अपना वाहन इसलिए बनाया क्योंकि मोर शक्ति, सुंदरता और ज्ञान का प्रतीक है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान विष्णु ने कार्तिकेय को उनके तप और शक्तिशाली स्वभाव से प्रसन्न होकर मोर को उनका वाहन बनाया था। 

भगवान कार्तिकेय ने मोर को ही क्यों बनाया अपना वाहन, जानें धार्मिक मान्यता
Bhagwan Kartikeya Pauranik Katha: भारत के कई हिस्सों में भगवान कार्तिकेय को स्कंद, मुरुगन, सुब्रह्मण्यम और षडानन के नाम से भी जाना जाता है, जो देवों के सेनापति हैं। वे भगवान शिव और माता पार्वती के सबसे बड़े पुत्र हैं। उनका वाहन एक सुंदर और शक्तिशाली मोर है, जिसका नाम परवानी है। भगवान कार्तिकेय का मोर को अपना वाहन चुनने के पीछे एक दिलचस्प पौराणिक कथा और गहरी धार्मिक मान्यता छिपी हुई है। इसके पीछे कई पौराणिक कथाएं और मान्यताएं प्रचलित हैं, जिनमें से एक प्रमुख कथा इस प्रकार है...

अहंकार का नाश और ज्ञान का प्रतीक

पौराणिक कथा के अनुसार, एक बार भगवान शिव और माता पार्वती ने अपने दोनों पुत्रों, गणेश और कार्तिकेय, से कहा कि जो कोई भी पृथ्वी की परिक्रमा सबसे पहले करके लौटेगा, उसे प्रथम पूज्य माना जाएगा और उसे विशेष वरदान मिलेगा। भगवान कार्तिकेय अपने वाहन मोर पर बैठकर तुरंत पृथ्वी की परिक्रमा के लिए निकल पड़े, क्योंकि मोर अत्यंत तीव्र गति से उड़ सकता है।


वहीं, भगवान गणेश ने अपनी बुद्धि और विवेक का प्रयोग किया। उन्होंने अपने माता-पिता (भगवान शिव और पार्वती) की ही सात बार परिक्रमा की और कहा कि 'माता-पिता में ही समस्त लोक समाहित हैं', इसलिए उनकी परिक्रमा पृथ्वी की परिक्रमा के समान है। गणेश जी की इस बुद्धिमत्ता से शिव-पार्वती अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्हें प्रथम पूज्य का वरदान दिया।

जब कार्तिकेय अपनी यात्रा पूरी करके लौटे, तो उन्होंने देखा कि गणेश जी पहले ही परिक्रमा कर चुके हैं और उन्हें वरदान भी मिल चुका है। इस बात से कार्तिकेय को थोड़ा अहंकार महसूस हुआ कि उनके तीव्र गति वाले वाहन के बावजूद वे पिछड़ गए। भगवान शिव ने कार्तिकेय के इस अहंकार को दूर करने का निर्णय लिया। उन्होंने मोर को भगवान कार्तिकेय का वाहन बनने का आदेश दिया। मोर, जो अपनी सुंदरता और गति पर गर्व करता था, उसे भी अपने अहंकार को त्यागना पड़ा।

इस प्रकार, मोर भगवान कार्तिकेय का वाहन बना और यह इस बात का प्रतीक बना कि ज्ञान (गणेश) अहंकार (मोर) पर हमेशा विजय प्राप्त करता है। भगवान कार्तिकेय का मोर पर विराजमान होना अहंकार पर नियंत्रण और ज्ञान की महत्ता को भी दर्शाता है।

शक्ति और सौंदर्य

मोर शक्ति, सौंदर्य और शाही ठाट-बाट का प्रतीक है। भगवान कार्तिकेय स्वयं युद्ध के देवता और अत्यंत सुंदर हैं, इसलिए मोर उनका आदर्श वाहन है।

बुराई पर विजय

मोर सांपों का भक्षक होता है। भगवान कार्तिकेय को दैत्यों और बुराई का नाश करने वाला माना जाता है। मोर का उनका वाहन होना यह भी दर्शाता है कि वे बुराई और नकारात्मकता का अंत करते हैं।

बृहस्पति से संबंध

ज्योतिष शास्त्र में मोर का संबंध बृहस्पति ग्रह से भी जोड़ा जाता है। बृहस्पति ज्ञान, विवेक और शुभता के कारक हैं। भगवान कार्तिकेय स्वयं ज्ञान और युद्ध कौशल के देवता हैं, इसलिए यह संबंध भी उनके वाहन के लिए उपयुक्त है।

दिव्य पक्षी

मोर को एक दिव्य पक्षी माना जाता है, जिसका संबंध इंद्र देव से भी रहा है। इसका दिव्य स्वरूप कार्तिकेय जैसे देव सेनापति के लिए उपयुक्त है। इस प्रकार, भगवान कार्तिकेय का मोर को अपना वाहन बनाना केवल एक साधारण घटना नहीं, बल्कि गहरे प्रतीकात्मक अर्थों से भरी है, जो ज्ञान, अहंकार पर विजय, शक्ति और सौंदर्य का संदेश देती है।

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