महाभारत काल के सबसे वीर योद्धा के बारे में आप तो जानते ही होंगे कि उन्होंने कई बड़े योद्धाओं को पराजित किया और विजयी हए। क्या आपको पता है कि उनके पास कौन सा दिव्य धनुष था और कैसे प्राप्त हुआ।
Mahabharat: महाभारत के महान योद्धा अर्जुन ने कई बड़े-बड़े योद्धाओं को पराजित किया और उन पर विजय हासिल की। उन्होंने जिस धनुष से दुश्मनों का संहार किया उस धनुष को उन्हें अग्निदेव ने दिया था और उस धनुष का नाम गांडीव था। पौराणिक कथा के अनुसार, अग्निदेव को खांडव वन को जलाकर स्वयं को तृप्त करना था, लेकिन इंद्रदेव वन में रहने वाले तक्षक नाग की रक्षा करते थे, जिससे अग्निदेव अपना कार्य पूरा नहीं कर पा रहे थे। तब अग्निदेव ने भगवान कृष्ण और अर्जुन से खांडव वन को जलाने में उनकी सहायता करने का अनुरोध किया।
जब कृष्ण और अर्जुन ने सहायता का वचन दिया, तब अग्निदेव ने उन्हें युद्ध में सहयोग करने के लिए कुछ दिव्य अस्त्र-शस्त्र दिए। इसी समय अग्निदेव ने अर्जुन को गांडीव धनुष, एक अक्षय तरकश (जिसमें तीर कभी खत्म नहीं होते थे), और दिव्य घोड़ों से जुता एक रथ प्रदान किया। गांडीव धनुष का एक लंबा और दिव्य इतिहास है। यह मूल रूप से ब्रह्मा जी ने बनाया था, और फिर कई देवताओं और दिव्य सत्ताओं के पास रहा, जिनमें भगवान शिव, देवराज इंद्र और वरुण देव शामिल हैं। अंततः, वरुण देव ने इसे अग्निदेव को दिया, जिन्होंने इसे अर्जुन को सौंप दिया।
गांडीव धनुष की विशेषताएं
यह धनुष अत्यंत शक्तिशाली और लगभग अविनाशी था। इसकी टंकार (धनुष की डोरी खींचने की ध्वनि) इतनी प्रचंड थी कि युद्धभूमि में शत्रुओं के हृदय भय से कांप उठते थे। यह एक साथ लाखों धनुषों की शक्ति रखता था, जिससे अर्जुन को अजेय योद्धा माना जाता था। महाभारत के महायोद्धा अर्जुन को जिस दिव्य धनुष से इतनी ख्याति मिली, उसका नाम गांडीव था। यह धनुष उन्हें अग्निदेव ने दिया था। अर्जुन के दिव्य धनुष का नाम गांडीव (Gandiva) था। इसी कारण अर्जुन को 'गांडीवधारी' के नाम से भी जाना जाता है।
गांडीव एक साधारण धनुष नहीं था, बल्कि इसमें कई अलौकिक गुण थे। यह धनुष अत्यंत मजबूत और लचीला था, जिसे कोई अन्य शस्त्र नष्ट नहीं कर सकता था। यह हमेशा अर्जुन के साथ रहता था और कभी भी उनके हाथों से नहीं गिरता था, चाहे वे कितनी भी थकान में क्यों न हों। यह एक साथ लाखों धनुषों की शक्ति रखता था, जिससे अर्जुन अकेले ही विशाल सेनाओं का सामना कर सकते थे। गांडीव धनुष ने महाभारत के युद्ध में अर्जुन को एक अजेय योद्धा बनाया और धर्म की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
युद्ध बाद कहां गया धनुष?
महाभारत युद्ध समाप्त होने और भगवान कृष्ण के स्वधाम गमन के बाद, अर्जुन को मिले दिव्य अस्त्र-शस्त्रों को वापस उनके मूल देवताओं को लौटा दिया गया था। महाभारत की कथा के अनुसार, भगवान कृष्ण के देह त्याग के बाद, अर्जुन को यह आदेश मिला था कि वे गांडीव धनुष को वरुण देव को लौटा दें। कथा यह है कि जब भगवान कृष्ण ने अपनी लीला समाप्त की और पृथ्वीलोक को त्याग दिया, तो अर्जुन अपनी दिव्य शक्तियों और अस्त्रों को खोने लगे।
इसी दौरान, अग्निदेव (या कुछ कथाओं में वरुण देव स्वयं) अर्जुन के पास आए और उन्हें स्मरण कराया कि अब गांडीव धनुष और अक्षय तरकश का उद्देश्य पूर्ण हो गया है और उन्हें उनके मूल स्थान पर लौटा देना चाहिए। अर्जुन ने अग्निदेव (या वरुण देव) के निर्देशानुसार गांडीव धनुष को समुद्र में प्रवाहित कर दिया, जिससे वह वापस वरुण देव के पास लौट गया।
क्या मानते हैं लोग?
कुछ लोगों का मानना है कि अर्जुन ने अपने गांडीव धनुष को इसी जगह पर एक पहाड़ी की चोटी के पत्थर के नीचे छिपाया था। इस मंदिर में आज भी धनुष-बाण चढ़ाए और पूजे जाते हैं, लेकिन यह प्रतीकात्मक है। लेकिन पौराणिक ग्रंथों के अनुसार, गांडीव धनुष अपनी दिव्य प्रकृति के कारण वापस अपने सोर्स, यानी वरुण देव को लौटा दिया गया था। यह अब भौतिक रूप में पृथ्वी पर मौजूद नहीं है।