Durga Saptashati Kshama Prarthana: नवरात्रि के दौरान मां दुर्गा की विशेष पूजा की जाती है। आपको बता दें कि नवरात्रि के नौ दिनों तक भक्त मां दुर्गा की विशेष पूजा करते हैं। नवरात्रि के नौ दिनों में देवी दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है। पूजा के दौरान भक्त अनजाने में ऐसी गलतियां कर बैठते हैं जिनका उन्हें पता नहीं चलता। आज के लेख में हम आपको एक ऐसी प्रार्थना के बारे में बताएंगे जिसे पढ़ने से मां दुर्गा आपकी सभी गलतियों को माफ कर देंगी और आपसे प्रसन्न होंगी। पूजा समाप्त करने के बाद आपको यह पाठ जरूर करना चाहिए।
दुर्गा सप्तशती क्षमा प्रार्थना
अपराधसहस्राणि क्रियन्तेऽहर्निशं मया।
दासोऽयमिति मां मत्वा क्षमस्व परमेश्वरि।।1।।
हे परमेश्वरि ! मेरे द्वारा रात-दिन सहस्रों अपराध होते रहते हैं। यह मेरा दास है? यो समझकर मेरे उन अपराध को तुम कृपापूर्वक क्षमा करो
आवाहनं न जानामि न जानामि विसर्जनम् ।
पूजां चैव न जानामि क्षम्यतां परमेश्वरि ।। 2 ।।
हे परमेश्वरि ! मैं आवाहन नहीं जानता, विसर्जन करना नहीं जानता तथा पूजा करनेका ढंग भी नहीं जानता, इसलिए हे माता मुझे क्षमा करो।
मन्त्रहीनं क्रियाहीनं भक्तिहीनं सुरेश्वरि
यत्पूजितं मया देवि परिपूर्णं तदस्तु मे ॥ 3॥
देवि सुरेश्वरि! मैंने जो मन्त्रहीन क्रियाहीन और भक्तिहीन पूजन किया है, वह सब आपकी कृपासे पूर्ण हो।
अपराधशतं कृत्वा जगदम्बेति चोचरेत्
यां गतिं समवाप्नोति न तां ब्रह्मादयः सुराः ॥ 4 ॥
सैकड़ों अपराध करके भी जो तुम्हारी शरणमें जा ‘जगदम्ब' कहकर पुकारता है, उसे वह गति प्राप्त होती है, जो ब्रह्मादि देवताओंके लिये भी सुलभ नहीं है।
सापराधोऽस्मि शरणं प्राप्तस्त्वां जगदम्बिके
इदानीमनुकम्प्योऽहं यथेच्छसि तथा कुरु ॥ 5 ॥
जगदम्बिके ! मैं अपराधी हूँ, किंतु तुम्हारी शरण में आया हूँ । इस समय दयाका पात्र हूँ। तुम जैसा चाहो, करो।
अज्ञानाद्विस्मृतेर्भ्रान्त्या यन्न्यूनमधिकं कृतम्
तत्सर्व क्षम्यतां देवि प्रसीद परमेश्वरि ॥ 6 ।।
देवि ! परमेश्वरि ! अज्ञानसे, भूल से अथवा बुद्धिभ्रान्त होनेके कारण मैंने जो न्यूनता या अधिकता कर दी हो, वह सब क्षमा करो और हम पर प्रसन्न हो जाओ।
कामेश्वरि जगन्मातः सच्चिदानन्दविग्रहे
गृहाणाचमिमां प्रीत्या प्रसीद परमेश्वरि ॥ 7॥
सच्चिदानन्दस्वरूपा परमेश्वरि ! जगन्माता कामेश्वरि ! तुम प्रेमपूर्वक और कृपापूर्वक मेरी यह पूजा स्वीकार करो और मुझ पर प्रसन्न रहो।
गुह्यातिगुह्यगोप्त्री त्वं गृहाणास्मत्कृतं जपम्
सिद्धिर्भवतु मे देवि त्वत्प्रसादात्सुरेश्वरि ॥ 8 ॥
देवि ! सुरेश्वरि ! तुम गोपनीय से भी गोपनीय वस्तु की रक्षा करनेवाली हो मेरे द्वारा किये हुए। इस जपको ग्रहण करो। हे माँ! तुम्हारी कृपासे मुझे सिद्धि प्राप्त हो।
॥ श्रीदुर्गार्पणमस्तु ॥