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Shiva Tandava Stotra: रावण ने क्यों की थी शिव तांडव स्तोत्र रचना, जानिए

जीवांजलि धार्मिक डेस्क Published by: कोमल Updated Wed, 19 Jun 2024 07:08 AM IST
सार

Shiva Tandava Stotra: शिव तांडव स्तोत्र को बहुत ही चमत्कारी माना जाता है। इसकी रचना रावण ने की है। शिव तांडव स्तोत्र का पाठ भगवान शिव को किसी भी अन्य पाठ से अधिक प्रिय है। इसका पाठ करने से भगवान शिव बहुत जल्दी प्रसन्न होते हैं।

शिव तांडव
शिव तांडव- फोटो : jeevanjali

विस्तार

Shiva Tandava Stotra: शिव तांडव स्तोत्र को बहुत ही चमत्कारी माना जाता है। इसकी रचना रावण ने की है। शिव तांडव स्तोत्र का पाठ भगवान शिव को किसी भी अन्य पाठ से अधिक प्रिय है। इसका पाठ करने से भगवान शिव बहुत जल्दी प्रसन्न होते हैं। आइए आपको बताते हैं कि रावण ने शिव तांडव स्तोत्र की रचना क्यों की थी
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पौराणिक कथाओं के अनुसार

रावण के पिता ऋषि विश्रवा थे और कुबेर रावण के सौतेले भाई थे। लंका का राज्य ऋषि विश्रवा ने कुबेर को दे दिया था, लेकिन किसी कारणवश वे लंका छोड़कर हिमाचल चले गए। कुबेर के जाने के बाद लंका का राज दशानन को मिला और वह लंका का स्वामी बन गया। लंका का राज्य पाकर दशानन अहंकारी हो गया, अहंकार के नशे में उसने ऋषि-मुनियों पर कई तरह के अत्याचार करने शुरू कर दिए। जब कुबेर को इस बात का पता चला तो उसने दशानन को समझाने की कोशिश की। जिससे दशानन क्रोधित हो गया और उसने कुबेर की नगरी अलकापुरी पर आक्रमण करने के लिए प्रस्थान किया। कुबेर को हराने के बाद रावण अपने पुष्पक विमान से लंका की ओर जा रहा था। रास्ते में उसके विमान के सामने एक विशाल कैलाश पर्वत आ गया, जिसके कारण विमान रुक गया और आगे नहीं बढ़ सका। विमान को रास्ता देने के लिए रावण ने कैलाश पर्वत को अपने रास्ते से हटाने की कोशिश की, जिससे पूरा कैलाश पर्वत हिल गया।

तब शिव भक्त नंदी ने रावण को ऐसा करने से रोका। लेकिन रावण ने नंदी का अपमान करते हुए उसे अपने रास्ते से हटने को कहा और रावण फिर से कैलाश पर्वत को रास्ते से हटाने की कोशिश करने लगा। तभी भगवान शिव ने अपने पैर के अंगूठे से कैलाश पर्वत को हल्के से छुआ।
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ऐसा करने से कैलाश पर्वत अपनी सतह से चिपक गया और रावण का हाथ उसके नीचे आने से  बुरी तरह से घायल हो गए। तब अत्यधिक पीड़ा के कारण दशानन बुरी तरह से चीखने लगा। उसकी चीख इतनी तेज थी कि ऐसा लग रहा था मानो प्रलय आ जाएगा।

शिव तांडव स्तोत्र की उत्पत्ति Shiva Tandava Stotra Kee Utpatti

अत्यधिक पीड़ा और क्रोध के कारण इस भयानक चीख में दशानन भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए उनकी स्तुति करने लगा। दशानन ने सामवेद में वर्णित शिव के सभी स्तोत्रों को गान शुरू कर दिया। तब भगवान शिव उसकी स्तुति से प्रसन्न हुए और उन्होंने दशानन को क्षमा कर दिया और पर्वत के नीचे फसे उसके हाथों को भी मुक्त कर दिया। भगवान शिव की स्तुति करने के लिए दशानन ने भयंकर पीड़ा में जो सामवेद का स्तोत्र गाया था, वह रावण स्तोत्र या शिव तांडव स्तोत्र के नाम से जाना गया।

शिव तांडव स्तोत्र Shiva Tandava Stotra

जटाटवीगलज्जलप्रवाहपावितस्थले
गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजङ्गतुङ्गमालिकाम् ।
डमड्डमड्डमड्डमन्निनादवड्डमर्वयं
चकार चण्डताण्डवं तनोतु नः शिवः शिवम् ॥॥

जटाकटाहसम्भ्रमभ्रमन्निलिम्पनिर्झरी
विलोलवीचिवल्लरीविराजमानमूर्धनि ।
धगद्धगद्धगज्ज्वलल्ललाटपट्टपावके
किशोरचन्द्रशेखरे रतिः प्रतिक्षणं मम ॥॥

धराधरेन्द्रनंदिनीविलासबन्धुबन्धुर
स्फुरद्दिगन्तसन्ततिप्रमोदमानमानसे ।
कृपाकटाक्षधोरणीनिरुद्धदुर्धरापदि
क्वचिद्दिगम्बरे(क्वचिच्चिदम्बरे) मनो विनोदमेतु वस्तुनि ॥॥

जटाभुजङ्गपिङ्गलस्फुरत्फणामणिप्रभा
कदम्बकुङ्कुमद्रवप्रलिप्तदिग्वधूमुखे ।
मदान्धसिन्धुरस्फुरत्त्वगुत्तरीयमेदुरे
मनो विनोदमद्भुतं बिभर्तु भूतभर्तरि ॥॥

सहस्रलोचनप्रभृत्यशेषलेखशेखर
प्रसूनधूलिधोरणी विधूसराङ्घ्रिपीठभूः ।
भुजङ्गराजमालया निबद्धजाटजूटक
श्रियै चिराय जायतां चकोरबन्धुशेखरः ॥॥

ललाटचत्वरज्वलद्धनञ्जयस्फुलिङ्गभा
निपीतपञ्चसायकं नमन्निलिम्पनायकम् ।
सुधामयूखलेखया विराजमानशेखरं
महाकपालिसम्पदेशिरोजटालमस्तु नः ॥॥

करालभालपट्टिकाधगद्धगद्धगज्ज्वल
द्धनञ्जयाहुतीकृतप्रचण्डपञ्चसायके ।
धराधरेन्द्रनन्दिनीकुचाग्रचित्रपत्रक
प्रकल्पनैकशिल्पिनि त्रिलोचने रतिर्मम ॥॥

नवीनमेघमण्डली निरुद्धदुर्धरस्फुरत्
कुहूनिशीथिनीतमः प्रबन्धबद्धकन्धरः ।
निलिम्पनिर्झरीधरस्तनोतु कृत्तिसिन्धुरः
कलानिधानबन्धुरः श्रियं जगद्धुरंधरः ॥॥

प्रफुल्लनीलपङ्कजप्रपञ्चकालिमप्रभा
वलम्बिकण्ठकन्दलीरुचिप्रबद्धकन्धरम् ।
स्मरच्छिदं पुरच्छिदं भवच्छिदं मखच्छिदं
गजच्छिदांधकच्छिदं तमन्तकच्छिदं भजे ॥॥

अगर्व सर्वमङ्गलाकलाकदम्बमञ्जरी
रसप्रवाहमाधुरी विजृम्भणामधुव्रतम् ।
स्मरान्तकं पुरान्तकं भवान्तकं मखान्तकं
गजान्तकान्धकान्तकं तमन्तकान्तकं भजे ॥॥

जयत्वदभ्रविभ्रमभ्रमद्भुजङ्गमश्वस
द्विनिर्गमत्क्रमस्फुरत्करालभालहव्यवाट् ।
धिमिद्धिमिद्धिमिध्वनन्मृदङ्गतुङ्गमङ्गल
ध्वनिक्रमप्रवर्तित प्रचण्डताण्डवः शिवः ॥॥

दृषद्विचित्रतल्पयोर्भुजङ्गमौक्तिकस्रजोर्
गरिष्ठरत्नलोष्ठयोः सुहृद्विपक्षपक्षयोः ।
तृणारविन्दचक्षुषोः प्रजामहीमहेन्द्रयोः
समं प्रव्रितिक: कदा सदाशिवं भजाम्यहम ॥॥

कदा निलिम्पनिर्झरीनिकुञ्जकोटरे वसन्
विमुक्तदुर्मतिः सदा शिरः स्थमञ्जलिं वहन् ।
विमुक्तलोललोचनो ललामभाललग्नकः
शिवेति मंत्रमुच्चरन् कदा सुखी भवाम्यहम् ॥॥

निलिम्प नाथनागरी कदम्ब मौलमल्लिका-
निगुम्फनिर्भक्षरन्म धूष्णिकामनोहरः ।
तनोतु नो मनोमुदं विनोदिनींमहनिशं
परिश्रय परं पदं तदङ्गजत्विषां चयः ॥॥

प्रचण्ड वाडवानल प्रभाशुभप्रचारणी
महाष्टसिद्धिकामिनी जनावहूत जल्पना ।
विमुक्त वाम लोचनो विवाहकालिकध्वनिः
शिवेति मन्त्रभूषगो जगज्जयाय जायताम् ॥॥

इमं हि नित्यमेवमुक्तमुत्तमोत्तमं स्तवं
पठन्स्मरन्ब्रुवन्नरो विशुद्धिमेतिसंततम् ।
हरे गुरौ सुभक्तिमाशु याति नान्यथा गतिं
विमोहनं हि देहिनां सुशङ्करस्य चिंतनम् ॥॥

पूजावसानसमये दशवक्त्रगीतं
यः शम्भुपूजनपरं पठति प्रदोषे ।
तस्य स्थिरां रथगजेन्द्रतुरङ्गयुक्तां
लक्ष्मीं सदैव सुमुखिं प्रददाति शम्भुः ॥॥

इति श्रीरावण कृतम्
शिव ताण्डव स्तोत्र संपूर्णम

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