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Sawan Shivratri Vrat 2024: इस साल कब मनाई जाएगी सावन शिवरात्रि? जानिए तिथि शुभ मुहूर्त और पूजा विधि

जीवांजलि धार्मिक डेस्क Published by: कोमल Updated Tue, 09 Jul 2024 05:00 AM IST
सार

Sawan Shivratri Vrat 2024: सावन का पवित्र महीना भगवान शिव को समर्पित है। इस महीने में देवों के देव महादेव और माता पार्वती की विधि-विधान से पूजा की जाती है 

कब है सावन शिवरात्रि
कब है सावन शिवरात्रि- फोटो : jeevanjali

विस्तार

Sawan Shivratri Vrat 2024: सावन  का पवित्र महीना भगवान शिव को समर्पित है। इस महीने में देवों के देव महादेव और माता पार्वती की विधि-विधान से पूजा की जाती है आपको बता दें कि इस महीने में विधि- विधान से पूजा करने से व्यक्ति की सारी मनोकामनाएं पूरी होती हैं साथ ही महादेव का आशीर्वाद भी मिलता है। इसके साथ ही सावन शिवरात्रि का भी विशेष महत्व बताया गया है चलिए आपको बताते हैं  कि इस साल सावन शिवरात्रि का व्रत कब रखा जाएगा 

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कब है सावन शिवरात्रि 2024? Kab Hai Sawan Shivaraatri 2024?

इस साल सावन महीने की शुरुआत 22 जुलाई से  हो रही है और इस बार सावन की शुरुआत सोमवार के दिन से हो रही है और इस दिन कई शुभ योग भी बन रहे हैं।  वहीं, पंचांग के अनुसार, सावन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि 2 अगस्त को दोपहर 3:27 मिनट से शुरू होगी. वहीं, इसका समापन अगले दिन यानी 3 अगस्त को दोपहर 3:51 मिनट होगा. शिवरात्रि में शाम के समय पूजा का विशेष महत्व है, इसलिए सावन शिवरात्रि का व्रत 2 अगस्त को रखा जाएगा.आपको बता दें कि सावन के महीने में भक्त कावड़ लेने भी जाते हैं और शिवरात्रि के दिन अपने स्थान पर वापस आकर भगवान शिव का जल से अभिषेक भी करते हैं.

कैसे करें सावन शिवरात्रि पर भगवान शिव की पूजा Kaise Karen Sawan Shivaraatri Par Bhagavaan Shiv Ki Pooja

सावन शिवरात्रि के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान करें. इसके बाद व्रत का संकल्प लें.

स्नान करने के बाद साफ कपड़े पहनें और इसके बाद पूजा स्थल को अच्छे से सजाएं.

चौकी पर लाल कपड़ा बिछाकर शिव परिवार की तस्वीर रखें. 

इसके बाद कच्चा दूध, दही, गंगाजल और जल मिलाकर भगवान शिव का अभिषेक करें।

महादेव को चंदन और माता पार्वती को कुमकुम का तिलक लगाएं।

सबसे पहले देसी घी का दीपक जलाएं। अंत में भगवान शिव की चालीसा और शिव की आरती जरूर पढ़ें।

इसके साथ ही शिव चालीसा का भी पाठ करें 


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शिव चालीसा Shiv Chalisa

॥ चौपाई ॥
जय गिरिजा पति दीन दयाला ।
सदा करत सन्तन प्रतिपाला ॥

भाल चन्द्रमा सोहत नीके ।
कानन कुण्डल नागफनी के ॥

अंग गौर शिर गंग बहाये ।
मुण्डमाल तन क्षार लगाए ॥

वस्त्र खाल बाघम्बर सोहे ।
छवि को देखि नाग मन मोहे ॥ 4

मैना मातु की हवे दुलारी ।
बाम अंग सोहत छवि न्यारी ॥

कर त्रिशूल सोहत छवि भारी ।
करत सदा शत्रुन क्षयकारी ॥

नन्दि गणेश सोहै तहँ कैसे ।
सागर मध्य कमल हैं जैसे ॥

कार्तिक श्याम और गणराऊ ।
या छवि को कहि जात न काऊ ॥ 8

देवन जबहीं जाय पुकारा ।
तब ही दुख प्रभु आप निवारा ॥

किया उपद्रव तारक भारी ।
देवन सब मिलि तुमहिं जुहारी ॥

तुरत षडानन आप पठायउ ।
लवनिमेष महँ मारि गिरायउ ॥

आप जलंधर असुर संहारा ।
सुयश तुम्हार विदित संसारा ॥ 12

त्रिपुरासुर सन युद्ध मचाई ।
सबहिं कृपा कर लीन बचाई ॥

किया तपहिं भागीरथ भारी ।
पुरब प्रतिज्ञा तासु पुरारी ॥

दानिन महँ तुम सम कोउ नाहीं ।
सेवक स्तुति करत सदाहीं ॥

वेद नाम महिमा तव गाई।
अकथ अनादि भेद नहिं पाई ॥ 16

प्रकटी उदधि मंथन में ज्वाला ।
जरत सुरासुर भए विहाला ॥

कीन्ही दया तहं करी सहाई ।
नीलकण्ठ तब नाम कहाई ॥

पूजन रामचन्द्र जब कीन्हा ।
जीत के लंक विभीषण दीन्हा ॥

सहस कमल में हो रहे धारी ।
कीन्ह परीक्षा तबहिं पुरारी ॥ 20

एक कमल प्रभु राखेउ जोई ।
कमल नयन पूजन चहं सोई ॥

कठिन भक्ति देखी प्रभु शंकर ।
भए प्रसन्न दिए इच्छित वर ॥

जय जय जय अनन्त अविनाशी ।
करत कृपा सब के घटवासी ॥

दुष्ट सकल नित मोहि सतावै ।
भ्रमत रहौं मोहि चैन न आवै ॥ 24

त्राहि त्राहि मैं नाथ पुकारो ।
येहि अवसर मोहि आन उबारो ॥

लै त्रिशूल शत्रुन को मारो ।
संकट से मोहि आन उबारो ॥

मात-पिता भ्राता सब होई ।
संकट में पूछत नहिं कोई ॥

स्वामी एक है आस तुम्हारी ।
आय हरहु मम संकट भारी ॥ 28

धन निर्धन को देत सदा हीं ।
जो कोई जांचे सो फल पाहीं ॥

अस्तुति केहि विधि करैं तुम्हारी ।
क्षमहु नाथ अब चूक हमारी ॥

शंकर हो संकट के नाशन ।
मंगल कारण विघ्न विनाशन ॥

योगी यति मुनि ध्यान लगावैं ।
शारद नारद शीश नवावैं ॥ 32

नमो नमो जय नमः शिवाय ।
सुर ब्रह्मादिक पार न पाय ॥

जो यह पाठ करे मन लाई ।
ता पर होत है शम्भु सहाई ॥

ॠनियां जो कोई हो अधिकारी ।
पाठ करे सो पावन हारी ॥

पुत्र हीन कर इच्छा जोई ।
निश्चय शिव प्रसाद तेहि होई ॥ 36

पण्डित त्रयोदशी को लावे ।
ध्यान पूर्वक होम करावे ॥

त्रयोदशी व्रत करै हमेशा ।
ताके तन नहीं रहै कलेशा ॥

धूप दीप नैवेद्य चढ़ावे ।
शंकर सम्मुख पाठ सुनावे ॥

जन्म जन्म के पाप नसावे ।
अन्त धाम शिवपुर में पावे ॥ 40

कहैं अयोध्यादास आस तुम्हारी ।
जानि सकल दुःख हरहु हमारी ॥

॥ दोहा ॥
नित्त नेम कर प्रातः ही,
पाठ करौं चालीसा ।
तुम मेरी मनोकामना,
पूर्ण करो जगदीश ॥

मगसर छठि हेमन्त ॠतु,
संवत चौसठ जान ।
अस्तुति चालीसा शिवहि,
पूर्ण कीन कल्याण ॥


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