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Sawan Month Shiva Puja Vidhi: भगवान शिव की पूजा में क्यों वर्जित है शंख? जानिए क्या है वजह

जीवांजलि धर्म डेस्क Published by: निधि Updated Mon, 01 Jul 2024 01:12 PM IST
सार

Sawan Month Shiva Puja Vidhi: बहुत से लोग नहीं जानते कि शिव को शंख क्यों नहीं चढ़ाया जाता या शिव पूजा में शंख क्यों नहीं बजाया जाता। इसके पीछे का कारण शिव पुराण में है। आइए इस लेख में जानते हैं कि शिव पूजा में शंख का इस्तेमाल क्यों वर्जित है।
 

Sawan Month Shiva Puja Vidhi:
Sawan Month Shiva Puja Vidhi:- फोटो : jeevanjali

विस्तार

Sawan Month Shiva Puja Vidhi: हिंदू धर्म में हर देवी-देवता की पूजा के कुछ नियम होते हैं। भगवान विष्णु को शंख बहुत प्रिय है और शंख से जल चढ़ाने से भगवान विष्णु प्रसन्न होते हैं, लेकिन शिव की पूजा में शंख का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। धार्मिक दृष्टि से शंख को बहुत पवित्र माना जाता है। बहुत से लोग नहीं जानते कि शिव को शंख क्यों नहीं चढ़ाया जाता या शिव पूजा में शंख क्यों नहीं बजाया जाता। इसके पीछे का कारण शिव पुराण में है। आइए इस लेख में जानते हैं कि शिव पूजा में शंख का इस्तेमाल क्यों वर्जित है।
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शिवपुराण की कथा के अनुसार 

शिवपुराण की कथा के अनुसार दैत्यराज दंभ की कोई संतान नहीं थी। उसने संतान प्राप्ति के लिए घोर तपस्या की थी। दैत्यराज की घोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उसे वरदान मांगने को कहा। तब दंभ ने बहुत शक्तिशाली पुत्र का वरदान मांगा। विष्णु जी 'तथास्तु' कहकर अंतर्ध्यान हो गए। इसके बाद दंभ को एक पुत्र हुआ जिसका नाम शंखचूड़ रखा गया।ॉ

ब्रह्माजी ने दिया शंखचूड़ को वरदान

जब शंखचूड़ युवा हुआ तो उसने ब्रह्माजी को प्रसन्न करने के लिए पुष्कर में घोर तपस्या की। तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मदेव ने उसे वरदान मांगने को कहा तो शंखचूड़ ने वरदान मांगा कि वह देवताओं के लिए अजेय हो जाए। ब्रह्माजी ने 'तथास्तु' कहकर उसे श्री कृष्ण कवच दिया जिससे तीनों लोकों में सौभाग्य की प्राप्ति होगी। इसके बाद ब्रह्माजी ने शंखचूड़ की तपस्या से प्रसन्न होकर उसे धर्मध्वज की पुत्री तुलसी से विवाह करने की अनुमति दी और अंतर्ध्यान हो गए। ब्रह्माजी की अनुमति से तुलसी और शंखचूड़ का विवाह हो गया।
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शंखचूड़ में आया अहंकार, शिवजी भी नहीं कर पाए वध

ब्रह्माजी से वरदान पाकर शंखचूड़ अहंकारी हो गया और उसने तीनों लोकों पर अपना स्वामित्व स्थापित कर लिया। शंखचूड़ से परेशान देवताओं ने भगवान विष्णु से मदद मांगी, लेकिन भगवान विष्णु ने स्वयं दंभ के पुत्र का वरदान दिया था, इसलिए विष्णु ने शंकर की आराधना की, जिसके बाद शिव देवताओं की रक्षा के लिए चले गए, लेकिन श्री कृष्ण कवच और तुलसी की पतिव्रता के कारण शिव भी उसका वध नहीं कर पाए।

शंखचूड़ की हड्डियों से हुआ शंख उत्पन्न 

इसके बाद विष्णु जी ने ब्राह्मण का रूप धारण कर दैत्यराज से श्री कृष्ण कवच दान में ले लिया और शंखचूड़ का रूप धारण कर तुलसी के शील का हरण कर लिया। बाद में भगवान शिव ने विजय नामक अपने त्रिशूल से शंखचूड़ का वध कर दिया। शंखचूड़ की हड्डियों से शंख उत्पन्न हुआ, जिसका जल शंकर को छोड़कर सभी देवताओं के लिए शुभ माना जाता है।

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