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Sawan 2024: क्या है त्रिपुंड, शिव भक्त अपने ललाट पर क्यों करते है धारण? जानिए इन 3 रेखाओं का अर्थ और महत्व

जीवांजलि धर्म डेस्क Published by: निधि Updated Tue, 02 Jul 2024 08:20 AM IST
सार

Sawan 2024:  भगवान् शिव के भक्तों के लिए सावन का महीना बेहद पवित्र माह होता है। इस पूरे महीनें शिव की सेवा करने से शिव लोक की प्राप्ति हो जाती है।

सावन 2024
सावन 2024- फोटो : jeevanjali

विस्तार

Sawan 2024:  भगवान् शिव के भक्तों के लिए सावन का महीना बेहद पवित्र माह होता है। इस पूरे महीनें शिव की सेवा करने से शिव लोक की प्राप्ति हो जाती है। इस बार सावन की शुरुआत और अंत दोनों सोमवार को हो रहा है इसलिए कुल 5 व्रत आएंगे। सावन 22 जुलाई सोमवार से शुरू होकर 19 अगस्त सोमवार को ही पूर्ण होने जा रहा है। 
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आज इस लेख में हम आपको त्रिपुण्ड के बारे में बताने जा रहे है और साथ में यह भी समझाएंगे कि इन 3 रेखाओं का क्या महत्व है। ललाट आदि सभी निर्दिष्ट स्थानों में जो भस्म से तीन तिरछी रेखाएं बनाई जाती हैं उन्हीं को विद्वानों ने त्रिपुंड कहा है। भौहों के मध्य भाग से लेकर जहां तक भौहों का अंत है उतना बड़ा त्रिपुंड ललाट में धारण करना चाहिए।

क्या है त्रिपुंड

मध्यमा और अनामिका उंगली से दो रेखाएं कर के बीच में अंगुष्ठ द्वारा प्रतिलोम भाव से की गई रेखा त्रिपुण्ड्र कहलाती है। अथवा बीच की तीन अंगुलियों से भस्म लेकर यत्नपूर्वक भक्तिभाव से ललाट मे त्रिपुण्ड्र धारण करें। त्रिपुण्ड्र की तीनों रेखाओं में से प्रत्येक के 9-9 देवता है, जो सभी अंगों में स्थित हैं। प्रणव का प्रथम अक्षरअकार, गार्हपत्य अग्नि, पृथ्वी धर्म, रजोगुण, ऋग्वेद, क्रिया शक्ति, प्रातः सवन तथा महादेव ये त्रिपुंड की प्रथम रेखा के 9 देवता हैं। प्रणव का दूसरा अक्षर उकार, दक्षिणाग्नि, आकाश, सत्व गुण, यजुर्वेद, मध्यमदिनसवन, इच्छा शक्ति, अंतरात्मा तथा महेश्वर यह दूसरी रेखा के 9 देवता हैं।
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शिव भक्त अपने ललाट पर क्यों करते है धारण? 

प्रणव का तीसरा अक्षर मकार आहवनीय अग्नि, परमात्मा, तमोगुण, द्युलोक, ज्ञान शक्ति, सामवेद, तृतीयसवन तथा शिव यह तीसरी रेखा के 9 देवता हैं। त्रिनेत्र धारी, तीनों गुणों के आधार तथा तीनों देवताओं के जनक भगवान शिव का स्मरण करते हुए नमः शिवाय कहकर ललाट में त्रिपुंड लगाएं। ईश्याभ्याम नमः ऐसा कहकर दोनों पार्शव भागों में त्रिपुंड धारण करें। बीजाभ्याम नमः यह बोलकर दोनों कलाइयों में भस्म में लगाएं।

पित्रभ्याम नमः कहकर नीचे के अंग में. उमेशाभ्याम नमः कहकर ऊपर के अंग में तथा भीमाए नमः कहकर पीठ में और सिर के पिछले भाग में त्रिपुंड लगाना चाहिए। मस्तक, ललाट, कंठ, दोनों कंधों, दोनों भुजाओं, दोनों कोहनियों तथा दोनों कलाइयों में, ह्रदय में, नाभि में, दोनों पसलियों में, तथा पृष्ठ भाग में त्रिपुंड लगाकर वहां दोनों अश्विनी कुमारों का शिव, शक्ति, रूद्र, ईश तथा नारद का और वामा आदि नौ शक्तियों का पूजन करें। यह सब मिलकर 16 देवता है।
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