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Sawan 2024: क्या है ओंकार, कैसे हुई ॐ की उत्पत्ति? जानिए कहां से आया ओम नमः शिवाय मंत्र

जीवांजलि धर्म डेस्क Published by: निधि Updated Tue, 02 Jul 2024 12:48 PM IST
सार

Sawan 2024: भगवान् शिव के भक्तों के लिए सावन का महीना बेहद पवित्र माह होता है। इस पूरे महीनें शिव की सेवा करने से शिव लोक की प्राप्ति हो जाती है।

Sawan 2024
Sawan 2024- फोटो : jeevanjali

विस्तार

Sawan 2024:  भगवान् शिव के भक्तों के लिए सावन का महीना बेहद पवित्र माह होता है। इस पूरे महीनें शिव की सेवा करने से शिव लोक की प्राप्ति हो जाती है। इस बार सावन की शुरुआत और अंत दोनों सोमवार को हो रहा है इसलिए कुल 5 व्रत आएंगे। सावन 22 जुलाई सोमवार से शुरू होकर 19 अगस्त सोमवार को ही पूर्ण होने जा रहा है। आज इस लेख में हम आपको, ॐ की उत्पत्ति के रहस्य के बारे में बताने जा रहे है। 
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शिव के उत्तरवर्ती मुख से अकार का, पश्चिम मुख से उकार का, दक्षिण मुख से मकार का, पूर्ववर्ती मुख से बिंदु का तथा मध्यवर्ती मुख से नाद का प्राकट्य हुआ। इस प्रकार पाँच अवयवों से युक्त ओंकार का विस्तार हुआ है। इन सभी अवयवों से एकीभूत होकर वह प्रणव ‘ॐ’ नामक एक अक्षर हो गया। यह नाम-रूपात्मक सारा जगत तथा वेद उत्पन्न स्त्री-पुरुष वर्ग रूप दोनों कुल इस प्रणव-मन्त्र से व्याप्त हैं। वह अकारादि क्रमसे और मकारादि क्रम से क्रमश: प्रकाश में आया है (‘ॐ नम:शिवाय’ यह पंचाक्षर-मन्त्र हैं)।  उसी से शिरोमंत्र सहित त्रिपदा गायत्री का प्राकट्य हुआ है। उस गायत्री से सम्पूर्ण वेद प्रकट हुए है और उन वेदों से करोड़ों मन्त्र निकले हैं।

शिवपुराण की विद्येश्वर संहिता के अध्याय 9 में भगवान शंकर ब्रह्मा और विष्णु को ॐ मंत्र का रहस्य समझाते हैं। महादेव ने ब्रह्मा और विष्णु से कहा कि मैंने पूर्व काल में अपने स्वरूप भूतमंत्र का उपदेश किया है जो ओमकार के रूप में प्रसिद्ध है। वह महा मंगलकारी मंत्र है सबसे पहले मेरे मुख से ओंकार प्रकट हुआ जो मेरे स्वरूप का बोध कराने वाला है। ओमकार वाचक है और मैं वाच्य हूं। यह मंत्र मेरा स्वरूप ही है।
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प्रतिदिन ओमकार का निरंतर स्मरण करने से मेरा ही सदा स्मरण होता है। मेरे उत्तरवर्ती मुख से अकार का, पश्चिम मुख से उकार का, दक्षिण मुख से मकार का, पूर्ववर्ती मुख से बिंदु का तथा मध्यवर्ती मुख से नाद का प्राकट्य हुआ। इस प्रकार पाँच अवयवों से युक्त ओंकार का विस्तार हुआ है। इन सभी अवयवों से एकीभूत होकर वह प्रणव ‘ॐ’ नामक एक अक्षर हो गया। यह नाम-रूपात्मक सारा जगत तथा वेद उत्पन्न स्त्री-पुरुष वर्ग रूप दोनों कुल इस प्रणव-मन्त्र से व्याप्त हैं।

यह मन्त्र शिव और शक्ति दोनों का बोधक हैं। इसीसे पंचाक्षर-मन्त्र की उत्पत्ति हुई है, जो मेरे सकल रूप का बोधक हैं। वह अकारादि क्रमसे और मकारादि क्रम से क्रमश: प्रकाश में आया है (‘ॐ नम:शिवाय’ यह पंचाक्षर-मन्त्र हैं)। इस पंचाक्षर-मन्त्र से मातृका वर्ण प्रकट हुए हैं, जो पाँच भेदवाले हैं।

अ इ उ ऋ लू – ये पाँच मुलभुत स्वर हैं तथा व्यंजन भी पाँच – पाँच वर्णों से युक्त पाँच वर्गवाले हैं। उसी से शिरोमंत्र सहित त्रिपदा गायत्री का प्राकट्य हुआ है। उस गायत्री से सम्पूर्ण वेद प्रकट हुए है और उन वेदों से करोड़ों मन्त्र निकले हैं। उन-उन मन्त्रों से भिन्न-भिन्न कार्यों की सिद्धि होती है; परन्तु इस प्रणव एवं पंचाक्षर से सम्पूर्ण मनोरथों की सिद्धि होती है। इस मन्त्र समुदाय से भोग और मोक्ष दोनों सिद्ध होते हैं। मेरे सकल स्वरूप से सम्बन्ध रखनेवाले सभी मन्त्रराज साक्षात भोग प्रदान करने वाले और शुभकारक (मोक्षप्रद) हैं।

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