Pitru Paksha: पूर्वजों के देवता अर्यमा को माना जाता है, जो पितृलोक के राजा और न्यायाधीश हैं। पितरों को मुक्ति दिलाने के लिए पितृपक्ष में श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे अनुष्ठान किए जाते हैं, जिससे वे प्रसन्न होते हैं और उन्हें शांति मिलती है।
Pitru Paksha 2025: हिंदू धर्म के अनुसार, पितरों (पूर्वजों) के देवता यमराज हैं, जो धर्मराज के नाम से भी जाने जाते हैं। वे मृत्यु के देवता हैं और वही पितरों को उनके कर्मों के अनुसार फल देते हैं। पितृपक्ष के दौरान भी, यमराज ही पितरों को धरती पर अपने वंशजों से श्राद्ध और तर्पण ग्रहण करने की अनुमति देते हैं। पितरों को मुक्ति (मोक्ष) दिलाने के लिए कुछ विशेष कर्मकांड और क्रियाएं की जाती हैं। माना जाता है कि अगर ये क्रियाएं सही विधि से की जाएं तो पूर्वजों की आत्मा को शांति और मोक्ष मिलता है।
पुराणों के अनुसार, पूर्वजों के मुख्य देवता अर्यमा हैं, जिन्हें पितरों का राजा और अधिपति माना जाता है। अर्यमा चंद्रमंडल में स्थित पितृलोक के सभी पितरों का लेखा-जोखा रखते हैं। हिंदू धर्म में, पिता, दादा और परदादा को भी क्रमशः वसु, रुद्र और आदित्य देवता के समान माना जाता है।
पिंडदान और तर्पण
पितृपक्ष के दौरान पिंडदान और तर्पण का बहुत महत्व है। पिंडदान में चावल, जौ, और काले तिल से बने पिंडों को पितरों को अर्पित किया जाता है। वहीं, तर्पण में जल, दूध और तिल से उन्हें तृप्त किया जाता है। ये क्रियाएं पितरों को संतुष्टि प्रदान करती हैं।
गया में श्राद्ध
बिहार के गया में पिंडदान करना पितरों को मुक्ति दिलाने के लिए सबसे पवित्र माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि गया में श्राद्ध करने से पूर्वजों की 101 पीढ़ियों को मोक्ष मिलता है।
श्राद्ध कर्म
पितरों की मृत्यु तिथि पर श्राद्ध कर्म करना अत्यंत आवश्यक है। इसमें ब्राह्मणों को भोजन कराना, दान देना और उनकी पसंद का भोजन बनाना शामिल है। अंत्येष्टि संस्कार के बाद, मृतक व्यक्ति की आत्मा पितृलोक में प्रवेश करती है, जहां वह पितर बन जाती है।
ये सभी कर्मकांड यह सुनिश्चित करते हैं कि पूर्वजों की आत्मा को शांति मिले और वे जन्म-मृत्यु के चक्र से मुक्त हो सकें। यदि कोई व्यक्ति इन कर्मों को पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ करता है, तो उसे अपने पितरों का आशीर्वाद मिलता है, जिससे जीवन में सुख-समृद्धि आती है।