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Kanwar Yatra 2024: इस साल कब से शुरु होगी कांवड़ यात्रा, जानिए तिथि और महत्व

जीवांजलि धार्मिक डेस्क Published by: कोमल Updated Mon, 17 Jun 2024 06:07 AM IST
सार

Kanwar Yatra 2024: हिंदू धर्म में भोलेबाबा को प्रसन्न करने के लिए सावन का महीना बेहद लाभदायी माना जाता है. सावन में ही कांवड़ यात्रा का आयोजन होता है जिसमें शिव जी के भक्त कांवड़ में गंगा जल भरकर लाते हैं सावन शिवरात्रि पर शिवलिंग का अभिषेक करते हैं

कांवड़ यात्रा
कांवड़ यात्रा- फोटो : jeevanjali

विस्तार

Kanwar Yatra 2024: हिंदू धर्म में भोलेबाबा को प्रसन्न करने के लिए सावन का महीना बेहद लाभदायी माना जाता है. सावन में ही कांवड़ यात्रा का आयोजन होता है जिसमें शिव जी के भक्त कांवड़ में गंगा जल भरकर लाते हैं सावन शिवरात्रि पर शिवलिंग का अभिषेक करते हैं.मान्यता है ऐसा करने वालों पर भोलेनाथ की विशेष कृपा बरसती है. हज़ारों लाखों की तादाद में लोग कांवड़ लेकर शिव जी को जल चढ़ाने पैदल ही कांवड़ यात्रा पर निकल पड़ते हैं. आइए जानें कांवड़ यात्रा 2024 में कब शुरू हो रही है और इसका महत्व क्या है.
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कांवड़ यात्रा की तारीख 2024

इस साल यह पवित्र यात्रा 22 जुलाई 2024 दिन सोमवार से शुरू हो रही है. सावन शिवरात्रि पर जलाभिषेक किया जाता है. इस साल श्रावण मास अधिकमास है, इसलिए दो मासिक शिवरात्रि (सावन शिवरात्रि) होंगी. पहली शिवरात्रि 15 जुलाई को होगी और जल का समय 16 जुलाई को सुबह 12:11 बजे से 12:54 बजे के बीच होगा. दूसरी शिवरात्रि 14 अगस्त को होगी और जल का समय 15 अगस्त को सुबह 12:09 बजे से 12:54 बजे के बीच होगा.

कांवड़ यात्रा कब होती है? 

कांवड़ यात्रा हिंदू महीने श्रावण में होती है, जो अंग्रेजी कैलेंडर के अनुसार जुलाई और अगस्त का महीना होता है.  हालांकि, बिहार और झारखंड राज्य में सुल्तानगंज से देवघर तक की कांवड़ यात्रा कांवड़ियों द्वारा पूरे साल की जाती है. श्रद्धालु पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ नंगे पांव 100 किलोमीटर की यह यात्रा करते हैं। आंकड़ों के अनुसार, हर साल करीब 2 करोड़ श्रद्धालु इस पवित्र यात्रा को करते हैं. 'श्रावण मेला' के नाम से मशहूर यह मेला उत्तर भारत के सबसे बड़े धार्मिक मेलों में से एक है. कांवड़ यात्रा सिर्फ पुरुषों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसमें बड़ी संख्या में महिलाएं भी हिस्सा लेती हैं.
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कांवड़ यात्रा का महत्व

 कांवड़ यात्रा भगवान शिव के भक्तों द्वारा प्रतिवर्ष की जाने वाली एक शुभ तीर्थयात्रा है। इस यात्रा को जल यात्रा भी कहा जाता है क्योंकि इस प्रथा में 'कांवरिया' या कांवड़िया के रूप में जाने जाने वाले लोग बिहार के सुल्तानगंज, उत्तराखंड के गंगोत्री और गौमुख और हरिद्वार जैसे हिंदू तीर्थ स्थानों पर पवित्र गंगा से जल लाने के लिए जाते हैं और फिर अपने गृहनगर में शिव मंदिरों में 'गंगा जल' चढ़ाते हैं।
 

कांवड़ यात्रा के नियम

कांवड़ यात्रा वाले भक्तों को कांवड़ियों कहा जाता है. कांवड़ यात्रा पर जाने वाले भक्तों को इस दौरान ख़ास नियमों का भी पालन करना होता है, भक्त पैदल चलकर भोलेनाथ का जयकारा लगाते हैं और यात्रा करते हैं. यात्रा के दौरान भक्तों को सात्विक भोजन करना पड़ता है. साथ ही आराम करते समय भी कांवड़ ख़ुद जमीन पर नहीं रखा जाता है क्योंकि उसमें गंगाजल होता है.

 
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