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Chhath Puja: छठ पूजा में सूर्यदेव को क्यों दिया जाता है संध्या अर्घ्य, जानें पौराणिक कहानी

JeevanjaliPublished by:
नीरज पटेल
सार

Chhath Puja Niyam: छठ पूजा में संध्या अर्घ्य केवल एक पूजा विधि नहीं, बल्कि आस्था और जीवन दर्शन का उत्सव है। यह हमें सिखाता है कि जीवन में जब भी अंधकार आए, तब भी सूर्य की तरह धैर्य और उजाला बनाए रखना चाहिए।

छठ पूजा में सूर्यदेव को क्यों दिया जाता है संध्या अर्घ्य, जानें पौराणिक कहानी
Chhath Puja Surya Dev Sandhya Arghya: हिन्दू धर्म में भगवान सूर्य की उपासना का विशेष महत्व होता है। भगवान सूर्य को प्रत्यक्ष देवता कहा गया है, क्योंकि वे दृश्य रूप में संसार को प्रकाश, जीवन और ऊर्जा प्रदान करते हैं। वैदिक काल से लेकर आज तक, सूर्य की आराधना को शक्ति, आरोग्य और आत्मबल का सोर्स माना गया है। इसी भावना को जीवंत करती है छठ पूजा, जो भारत के सबसे प्राचीन और पवित्र पर्वों में से एक है। यह पर्व सूर्य देव और छठी मैया की उपासना का अद्भुत संगम है। छठ पूजा के दौरान दो बार सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है। संध्या अर्घ्य (सूर्यास्त के समय) और उषा अर्घ्य (सूर्योदय के समय), लेकिन क्या आप जानते हैं कि संध्या अर्घ्य क्यों दिया जाता है? इसके पीछे गहरा पौराणिक और आध्यात्मिक अर्थ छिपा है।

संध्या अर्घ्य क्या होता है?

छठ पूजा के तीसरे दिन, जब सूर्य अस्त होने लगता है, तब व्रती महिलाएं जलाशय (नदी, तालाब या घाट) पर जाती हैं और जल में खड़ी होकर सूर्य देव को “संध्या अर्घ्य” देती हैं। “अर्घ्य” का अर्थ है, भक्ति और कृतज्ञता के भाव से जल अर्पित करना। यह अर्घ्य सूर्य देव के उस रूप को समर्पित होता है, जो दिनभर की तपस्या के बाद अस्त होने जा रहे हैं। संध्या अर्घ्य सूर्य की विदाई का प्रतीक नहीं, बल्कि नव जीवन के स्वागत की तैयारी है। यह व्रतधारी के आत्मसंयम, समर्पण और कृतज्ञता की पराकाष्ठा को दर्शाता है।

अर्घ्य देने की क्या है परंपरा

संध्या अर्घ्य के समय घाटों पर भक्ति और सौंदर्य का अनूठा दृश्य देखने को मिलता है। महिलाएं जल में खड़ी होती हैं, सिर पर चुनरी लिए। हाथों में दूध, जल, पुष्प, दूब और दीप लेकर सूर्य देव को नमन करती हैं। वे गीत गाती हैं-

“डूब गइल सूरज देव, अर्घ देब हमीं,
तोहर किरनवा से, घर-आंगन चमकी।”


यह क्षण भावनाओं से भरा होता है। जहां सूर्य की लालिमा में श्रद्धा, आस्था और मातृत्व झलकता है।

संध्या अर्घ्य का धार्मिक महत्व

सूर्य देव का सम्मान और कृतज्ञता

संध्या अर्घ्य सूर्य देव के प्रति आभार व्यक्त करने का एक माध्यम है। सूर्य दिनभर सभी जीवों को जीवन, ऊर्जा और प्रकाश देते हैं। इसलिए जब वे अस्त होते हैं, तो हम उनके कार्यों के लिए आभार प्रकट करते हैं।

प्रकृति और जीवन के संतुलन का संदेश

सूर्य का अस्त होना और पुनः उदय होना जीवन के आवागमन, उत्थान और पतन का प्रतीक है। संध्या अर्घ्य यह सिखाता है कि जीवन में हर अंत एक नई शुरुआत का संकेत है।

शरीर और आत्मा की शुद्धि

जल में खड़े होकर सूर्य की किरणों को नमन करना शरीर में सकारात्मक ऊर्जा भरता है। विज्ञान के अनुसार, सूर्यास्त के समय की लाल किरणें शरीर के लिए लाभदायक होती हैं, जो तनाव घटाती हैं और आत्मिक शांति देती हैं।

व्रती की तपस्या की परीक्षा

संध्या अर्घ्य व्रत के तीसरे दिन दिया जाता है, जब उपासक ने पूरा दिन उपवास, मौन और संयम में बिताया होता है। यह अर्घ्य उसकी आस्था और सहनशीलता की परीक्षा का प्रतीक है।

संध्या अर्घ्य से जुड़ी पौराणिक कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, राजा प्रियव्रत की कोई संतान नहीं थी। उन्होंने महर्षि कश्यप के कहने पर छठी मैया और सूर्य देव की उपासना की। कई दिनों तक कठोर व्रत और तपस्या के बाद, छठी मैया उनके सामने प्रकट हुईं और उन्हें पुत्र प्राप्ति का वरदान दिया। राजा ने सूर्य देव को अर्घ्य देकर धन्यवाद दिया, और उसी दिन से संध्या अर्घ्य की परंपरा आरंभ हुई। यह परंपरा इस बात का प्रतीक बनी कि जब सूर्य अस्त होता है, तब भी उसकी कृपा समाप्त नहीं होती। वह अंधकार में भी जीवन का बीज छोड़ जाता है।

कर्ण की कथा (महाभारत कालीन संदर्भ)

महाभारत के महान योद्धा कर्ण, जो सूर्य देव के पुत्र माने जाते हैं, प्रतिदिन सूर्य को अर्घ्य दिया करते थे। वे सूर्यास्त के समय भी जल अर्पित करते थे, क्योंकि वे मानते थे कि सूर्य की अंतिम किरण में भी दान और तपस्या की शक्ति निहित होती है। कर्ण के इसी आचरण से प्रेरित होकर संध्या अर्घ्य की परंपरा प्रचलित हुई।

रामायण काल की कथा 

कथानुसार, जब भगवान श्रीराम अयोध्या लौटे, तो माता सीता ने अपने पति और राज्य की समृद्धि के लिए सूर्य देव और छठी मैया का व्रत किया। उन्होंने सूर्यास्त के समय जल में खड़े होकर सूर्य को संध्या अर्घ्य दिया। उसके बाद से यह परंपरा “छठ व्रत” के रूप में स्थायी हो गई।

आध्यात्मिक दृष्टि से संध्या अर्घ्य का अर्थ

संध्या का समय “दिन और रात के संगम” का प्रतीक है। यह वह क्षण है जब संसार स्थिर होता है और चेतना जागृत होती है। इसी समय सूर्य की अंतिम किरणें सबसे पवित्र मानी जाती हैं। संध्या अर्घ्य देने से मनुष्य की आत्मा, प्रकृति और देवत्व तीनों का मिलन होता है। यह हमें यह भी सिखाता है कि जब जीवन का सूर्य अस्त हो, तब भी आस्था की लौ जलती रहे।

संध्या अर्घ्य के दौरान किए जाने वाले अनुष्ठान

  • व्रती महिलाएं स्नान कर शुद्ध वस्त्र पहनती हैं।
  • वे गंगाजल या स्वच्छ जल से भरा लोटा हाथ में लेती हैं।
  • लोटे में दूब, चावल, पुष्प, और दूध मिलाया जाता है।
  • सूर्य देव को जल अर्पित करते समय मंत्र बोला जाता है। “ॐ सूर्याय नमः।”
  • दीपक जलाकर आरती की जाती है और भक्ति गीत गाए जाते हैं।
  • सूर्य देव को अर्घ्य देते समय व्रती पूर्ण मौन में मन ही मन अपने परिवार की सुख-समृद्धि की प्रार्थना करती हैं।

संध्या अर्घ्य का वैज्ञानिक महत्व

हिन्दू धर्म में हर परंपरा के पीछे कोई न कोई वैज्ञानिक कारण होता है। संध्या अर्घ्य भी इससे अलग नहीं है। सूर्यास्त के समय की किरणें शरीर के लिए लाभदायक होती हैं। ये किरणें त्वचा को विटामिन-डी देती हैं और मानसिक शांति लाती हैं। जल में खड़े होकर सूर्य को देखना नेत्रों के लिए लाभकारी होता है। इससे नेत्रज्योति बढ़ती है और मन में एकाग्रता आती है। संध्या का समय शरीर की जैविक घड़ी को संतुलित करता है। यह समय दिन और रात के बीच की ऊर्जा को समाहित करता है।

लोकगीतों में संध्या अर्घ्य की महिमा

छठ पूजा के दौरान गाए जाने वाले गीतों में संध्या अर्घ्य की विशेष महिमा होती है।

“अस्ताचलगामी सूरज देव, अर्घ दिहल हम तोरा,
सुख-समृद्धि देस ललना के, राखिहें सदा गोरा।”


इन गीतों में नारी की भक्ति, समर्पण और परिवार के प्रति प्रेम झलकता है।

संध्या अर्घ्य का सामाजिक संदेश

छठ पूजा केवल धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक एकता का प्रतीक भी है। संध्या अर्घ्य के समय कोई छोटा-बड़ा, ऊंच-नीच नहीं होता है। सब मिलकर सूर्य को जल अर्पित करते हैं। यह परंपरा समाज में समानता, एकता और सहयोग का संदेश देती है।

जानें क्या है धार्मिक मान्यता

छठ पूजा में संध्या अर्घ्य केवल एक पूजा विधि नहीं, बल्कि आस्था और जीवन दर्शन का उत्सव है। यह हमें सिखाता है कि जीवन में जब भी अंधकार आए, तब भी सूर्य की तरह धैर्य और उजाला बनाए रखना चाहिए। सूर्य देव को दिया गया यह अर्घ्य भक्ति, तपस्या और कृतज्ञता का प्रतीक है। जो यह संदेश देता है कि सूर्य भले अस्त हो जाए, पर आस्था की किरण कभी नहीं बुझती।

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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।

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