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Chhath Puja: गन्ने के बिना क्यों अधूरी हैं छठ पूजा की रस्में, जानें क्या है मान्यता

JeevanjaliPublished by:
नीरज पटेल
सार

Chhath Puja Rasm: भारतीय संस्कृति में हर त्योहार प्रकृति, परंपरा और भक्ति का सुंदर संगम होता है। इन्हीं में से एक सबसे पवित्र और लोकआस्था से जुड़ा पर्व है छठ पूजा। यह पर्व सूर्य उपासना का सबसे बड़ा पर्व माना जाता है, इस दिन भक्त सूर्य देव और माता शष्ठी (छठी माई) की पूजा करते हैं और उनकी कृपा प्राप्त करते हैं।

गन्ने के बिना क्यों अधूरी हैं छठ पूजा की रस्में, जानें क्या है मान्यता
Chhath Puja Me Ganne Ka Mahatva: हिन्दू धर्म में छठ पूजा में हर एक वस्तु का अपना विशेष महत्व होता है। चाहे वह ठेकुआ हो, केले का घोघा, नारियल, या गन्ना (ईख)। लेकिन खास बात यह है कि गन्ने के बिना छठ पूजा की रस्में अधूरी मानी जाती हैं। आइए जानते हैं कि आखिर ऐसा क्यों कहा जाता है, गन्ने का छठ पूजा से क्या धार्मिक, पौराणिक और वैज्ञानिक संबंध है, और इस परंपरा की शुरुआत कब हुई। छठ पूजा मुख्य रूप से बिहार, झारखंड, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नेपाल के तराई क्षेत्रों में बड़े ही उत्साह से मनाई जाती है। यह पर्व सूर्य देव और छठी माई (शष्ठी देवी) को समर्पित है। चार दिनों तक चलने वाले इस पर्व में व्रती (उपासक) कठोर नियमों का पालन करते हैं।

छठ पूजा के पूरे अनुष्ठान में गन्ना हर दिन की पूजा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, विशेष रूप से सूर्य अर्घ्य के समय। गन्ना केवल एक पौधा नहीं, बल्कि जीवन, शक्ति और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। यह धरती माता के गर्भ से उत्पन्न होता है और सूर्य की किरणों से पकता है। इसीलिए छठ पूजा जैसे सूर्य उपासना पर्व में गन्ने को अत्यंत पवित्र माना गया है। गन्ने की लंबी डंडी उत्थान और विकास का प्रतीक है। यह दिखाती है कि जैसे गन्ना सीधा और ऊंचा बढ़ता है, वैसे ही मनुष्य को भी सत्य, संयम और श्रम से ऊपर उठना चाहिए।

ग्रंथों में क्या है जिक्र

पौराणिक ग्रंथों में उल्लेख मिलता है कि सूर्य देव को मीठा और प्राकृतिक अर्पण प्रिय है। गन्ना, जो धरती और सूर्य की संयुक्त ऊर्जा से उपजता है, सूर्य देव के लिए सबसे पवित्र भेंट मानी जाती है। छठ पूजा के समय जब सूर्य को अर्घ्य दिया जाता है, तो गन्ने की जोड़ी (प्रायः दो डंडियां) पूजा स्थल के दोनों ओर लगाई जाती हैं। कहा जाता है कि गन्ना सूर्य का प्रतिनिधि है, और उसकी उपस्थिति से पूजा में सूर्य की पूर्ण ऊर्जा का आह्वान होता है। गन्ने की दो डंडियां पति-पत्नी, दिन-रात या जीवन-मृत्यु के संतुलन का प्रतीक भी मानी जाती हैं।

छठ पूजा में गन्ने की भूमिका

छठ पूजा में गन्ने का उपयोग “घोघा” या मंडप सजाने में किया जाता है। इसे चारों कोनों में खड़ा करके बांधा जाता है, जिससे एक प्राकृतिक छत्र बनता है। यह छत्र सूर्य देव और छठी माई की छाया का प्रतीक है। सूर्य अर्घ्य के दौरान व्रती गन्ने को जल में डुबोकर अर्घ्य देते हैं। इससे यह माना जाता है कि सूर्य देव की किरणें गन्ने के माध्यम से पृथ्वी और भक्त तक पहुंचती हैं, जो समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं। खरना के बाद तैयार किए गए ठेकुआ, गुड़, दूध और फल के साथ गन्ना भी प्रसाद का हिस्सा होता है, क्योंकि यह प्राकृतिक मिठास का प्रतीक है। किसी कृत्रिम पदार्थ से रहित, शुद्ध और सात्विक।

पौराणिक कथा से संबंध

एक पौराणिक कथा के अनुसार, एक समय सूर्यदेव की कृपा से कुरु वंश की रानी छठी माई (देवी शष्ठी) का अवतार हुआ, जो बच्चों की रक्षा करती थीं। जब सूर्यदेव पृथ्वी पर जीवन देने हेतु अपनी उष्णता बढ़ाते थे, तब धरती सूख जाती थी। तब छठी माई ने सूर्य को प्रसन्न करने के लिए गन्ने और जल का अर्घ्य दिया। सूर्यदेव प्रसन्न होकर बोले हे देवी! जिस दिन मेरी किरणें गन्ने के रस में मिलेंगी, उस दिन से पृथ्वी पर उर्वरता और जीवन कभी समाप्त नहीं होगा। तब से गन्ने को सूर्य उपासना का अभिन्न अंग माना गया।

इस प्रकार गन्ना हमें यह सिखाता है कि जीवन में मिठास प्राप्त करने के लिए पहले कठिन परिश्रम और तपस्या आवश्यक है। ठीक वैसे ही जैसे छठ व्रत में उपवास और संयम रखा जाता है। गन्ने का प्रयोग केवल धार्मिक नहीं, बल्कि वैज्ञानिक रूप से भी उपयोगी है।
  • ऊर्जा का स्रोत: गन्ना ग्लूकोज और सुक्रोज से भरपूर होता है, जो प्राकृतिक ऊर्जा प्रदान करता है। व्रत के दौरान यह शरीर को शक्ति देता है।
  • प्राकृतिक फिल्टर: जब अर्घ्य के समय जल गन्ने से होकर गुजरता है, तो यह प्राकृतिक फिल्टर का काम करता है। जिससे जल शुद्ध माना जाता है।
  • प्रकृति संरक्षण का संदेश: गन्ने की खेती से भूमि की उर्वरता बनी रहती है। यह पौधा पर्यावरण को कार्बन डाइऑक्साइड से मुक्त करता है। इसलिए छठ जैसे प्रकृति-केंद्रित पर्व में इसका उपयोग पर्यावरणीय दृष्टि से भी सार्थक है।

लोक परंपरा और भावनात्मक जुड़ाव

बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के गांवों में जब छठ पूजा होती है, तो हर घर के आंगन या नदी तट पर गन्ने का मंडप बनाना सबसे पहला कार्य होता है। गन्ने के झुंड को “छठ मइया का दरबार” कहा जाता है। कहा जाता है कि जिस स्थान पर गन्ने की छाया पड़ती है, वहां छठी माई स्वयं विराजमान होती हैं। इसलिए व्रती गन्ने को अत्यंत श्रद्धा और पवित्रता से स्पर्श करते हैं।

गन्ने के बिना छठ अधूरी क्यों?

छठ पूजा का मूल संदेश है। प्रकृति, सूर्य और जल के प्रति आभार। गन्ना इन तीनों तत्वों का संयोग है। यह भूमि में उगता है, सूर्य की किरणों से पनपता है और जल के सहारे जीवित रहता है। इसलिए छठ पूजा में गन्ने का होना केवल परंपरा नहीं, बल्कि सृष्टि के तीन आधारों पृथ्वी, सूर्य और जल की प्रतीकात्मक उपस्थिति है। यदि गन्ना न हो, तो ऐसा माना जाता है कि पूजा में यह प्राकृतिक संतुलन अधूरा रह जाता है।

सामाजिक और पारिवारिक महत्व

गन्ना एकता और साथपन का भी प्रतीक है। जब व्रती गन्ने की जोड़ी लेकर घाट पर जाते हैं, तो यह पति-पत्नी या परिवार के संयुक्त जीवन का प्रतीक बनता है। यह दर्शाता है कि पूजा केवल व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरे परिवार और समाज की भलाई के लिए है।

जानें क्या है मान्यता

छठ पूजा में गन्ने का उपयोग केवल धार्मिक रीति नहीं, बल्कि प्रकृति के प्रति कृतज्ञता और जीवन के संतुलन का प्रतीक है। गन्ना हमें यह सिखाता है कि कठिन परिश्रम से जीवन में मिठास आती है, धरती और सूर्य के आशीर्वाद से समृद्धि मिलती है और भक्ति में यदि सादगी हो, तो हर अर्पण पूर्ण होता है। इसलिए छठ पूजा में कहा जाता है कि गन्ना बिना छठ अधूरी, क्योंकि यह सूर्य की किरणों और धरती की शक्ति का संगम है। गन्ने की जोड़ी के बिना छठ पूजा का मंडप अपूर्ण है, और यह परंपरा हमें बार-बार याद दिलाती है कि मानव और प्रकृति का संबंध अविभाज्य है।

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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी ज्योतिषीय, पौराणिक और धार्मिक मान्यताओं पर आधारित है तथा केवल सामान्य जानकारी के उद्देश्य से प्रस्तुत की गई है। अधिक जानकारी के लिए कृपया संबंधित विषय के विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य करें।

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