Chandra Grahan: चंद्रग्रहण के दौरान मंदिरों के कपाट बंद कर दिए जाने की परंपरा एक पुरानी धार्मिक मान्यता पर आधारित है। इसके पीछे कई ज्योतिषीय और आध्यात्मिक कारण हैं।
Lunar eclipse 2025 Temple Close: चंद्रग्रहण के दौरान मंदिरों को बंद करने के पीछे कई धार्मिक और आध्यात्मिक मान्यताएं हैं। यह सिर्फ एक परंपरा नहीं है, बल्कि इसके गहरे कारण हैं। चंद्रग्रहण से कुछ घंटे पहले सूतक काल शुरू हो जाता है, जिसे हिंदू धर्म में एक अशुभ समय माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि इस दौरान वातावरण में नकारात्मक ऊर्जा का संचार बढ़ जाता है। मंदिरों को इस नकारात्मक ऊर्जा से बचाने और उनकी पवित्रता बनाए रखने के लिए बंद कर दिया जाता है।
माना जाता है कि ग्रहण की हानिकारक किरणें और नकारात्मक ऊर्जा मूर्तियों की दिव्यता और पवित्रता पर बुरा असर डाल सकती हैं। इसलिए, मूर्तियों को ढक दिया जाता है या उन पर पर्दा डाल दिया जाता है, ताकि वे ग्रहण के प्रभाव से सुरक्षित रहें। ग्रहण के समय भगवान की मूर्ति को छूना और पूजा-पाठ करना वर्जित होता है। इस दौरान भगवान को आराम करने दिया जाता है। इसलिए, मंदिरों के कपाट बंद रहते हैं ताकि भक्त मूर्ति दर्शन न कर सकें।
क्यों बंद होते हैं मंदिर?
सूतक काल का प्रभाव
चंद्रग्रहण के समय सूतक काल शुरू होता है, जिसे अशुभ माना जाता है। यह समय इतना अशुभ होता है कि इसमें पूजा-पाठ या धार्मिक कार्य वर्जित माने गए हैं। चूंकि मंदिर भगवान का निवास स्थान होते हैं, इसलिए उन्हें भी नकारात्मक ऊर्जा के प्रभाव से बचाने के लिए बंद कर दिया जाता है।
मूर्ति की पवित्रता
माना जाता है कि ग्रहण की नकारात्मक ऊर्जा से मूर्तियों की दिव्यता और पवित्रता पर बुरा असर पड़ सकता है। इस ऊर्जा को मूर्तियों से दूर रखने के लिए उन पर पर्दा डाल दिया जाता है और कपाट बंद कर दिए जाते हैं।
पूजा-पाठ वर्जित
ग्रहण के समय भजन-कीर्तन, मंत्र जाप और हवन करना तो शुभ माना जाता है, लेकिन मूर्ति पूजा करना मना है। इसलिए, मंदिरों के मुख्य द्वार बंद कर दिए जाते हैं ताकि भक्त मूर्ति दर्शन न कर पाएं।
पाप से बचाव
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ग्रहण के समय खाना-पीना और शौच जैसी क्रियाएं करने से पाप लगता है। मंदिर भी एक तरह से पवित्र स्थान होते हैं, इसलिए इस दौरान इन्हें बंद रखकर भक्तों को इन पापों से बचाया जाता है।
ग्रहण के बाद क्या करें?
ग्रहण समाप्त होने के बाद ही मंदिरों के कपाट खोले जाते हैं। इसके बाद पूरे मंदिर को गंगाजल से शुद्ध किया जाता है। मूर्तियों को भी स्नान कराया जाता है। इसके बाद ही पूजा-पाठ दोबारा शुरू किया जाता है। इस तरह, मंदिर को ग्रहण के नकारात्मक प्रभाव से बचाया जाता है।