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Bhojan Ke Hindu Niyam: भोजन करने से पहले जरूर करें ये 11 काम, तभी मिलेगा भरपूर लाभ

जीवांजलि धर्म डेस्क Published by: निधि Updated Fri, 28 Jun 2024 02:55 PM IST
सार

Bhojan ke hindu niyam: भोजन करने के पूर्व वैसे तो कई तरह के कार्य किए जाते हैं जिससे भोजन करने का उत्तम फल मिलता है। परंतु यहां पर प्रस्तुत है मात्र 11 ऐसे कार्य जो भोजन करने के पूर्व करने से शरीर को उस भोजन का संपूर्ण लाभ प्राप्त होता है।
 

Bhojan ke hindu niyam
Bhojan ke hindu niyam- फोटो : jeevanjali

विस्तार

Bhojan ke hindu niyam: आयुर्वेद और हिन्दू धर्म अनुसार भोजन से ही रोग उत्पन्न होते हैं और भोजन की आदत बदलने से ही रोग समाप्त भी हो जाते हैं। भोजन करने के पूर्व वैसे तो कई तरह के कार्य किए जाते हैं जिससे भोजन करने का उत्तम फल मिलता है। परंतु यहां पर प्रस्तुत है मात्र 11 ऐसे कार्य जो भोजन करने के पूर्व करने से शरीर को उस भोजन का संपूर्ण लाभ प्राप्त होता है।

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1. भोजन परोसने के नियम : पात्राधो मंडलं कृत्वा पात्रमध्ये अन्नं वामे भक्ष्यभोज्यं दक्षिणे घृतपायसं पुरतः शाकादीन् (परिवेषयेत्)।- ऋग्वेदीय ब्रह्मकर्मसमुच्चय, अन्नसमर्पणविधि।

अर्थात भूमि पर जल से एक मंडल बनाकर उस पर थाली रखें या पाट पर थाली रखें। थाली के मध्य भाग में चावल, पुलाव, हलुआ आदि रखें। थाली में बाईं ओर चबाकर ग्रहण करने वाले पदार्थ रखें। थाली में दाईं ओर घी युक्त खीर परोसें। थाली में ऊपर की ओर बीच में नमक परोंसे। नमक के बाईं ओर नींबू, अचार, नारियल चटनी आदि परोसें। बाईं ओर छाछ, खीर, दाल, सब्जी, सलाद आदि परोसें। थाली के दाईं ओर पर ही पानी का गिलास रखा जाता है। भोजन की थाली पीतल या चांदी की होना चाहिए। यह नहीं है तो केल या खांकरे के पत्ते पर भोजन करें। पानी का गिलास तांबे का होना चाहिए।

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2. भोजन मंत्र:-

ॐ अन्नपूर्णे सदापूर्णे

शंकरप्राणवल्लभे। ज्ञानवैराग्यसिद्यर्थम् भिक्षां देहि च पार्वति।

ॐ सहनाववतु। सह नौ भुनक्तु। सह वीर्यं करवावहै।

तेजस्विनावधीतमस्तु। मा विद्विषावहै ॥

ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:: ॥

3. शुद्धि : 5 अंगों (2 हाथ, 2 पैर, मुख) को अच्छी तरह से धोकर शुद्धि करने के बाद ही भोजन करना चाहिए। अशुद्ध हाथ और मुख से किया गया भोजन रोग उत्पन्न करता है।

4. आह्वान : भोजन करने से पूर्व ईष्ट देव का आह्वान जरूर करें और थाली या पत्तल में एक ओर 3 कोल ब्रह्मा, विष्णु और महेश के लिए अलग से निकलकर रख दें। एक कोल अग्नि को समर्पित करना चाहिए।

5. दिशा : भोजन करते समय आपका मुख पूर्व या उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए। दक्षिण दिशा की ओर किया हुआ भोजन प्रेत को प्राप्त होता है और पश्चिम दिशा की ओर किया हुआ भोजन खाने से रोग की वृद्धि होती है।

6. थाली : भोजन की थाली को सदैव पाट, चटाई, चौक या टेबल पर सम्मान के साथ रखने के बाद ही भोजन करें। ध्यान रहे कि आपके आसन से ऊंचा भोजन का आसन रहना चाहिए।

7. आसन : भोजन किसी लकड़ी, कुश या कपड़े के आसन पर सुखासन में या आल्की-पाल्की मारकर बैठकर ही करना चाहिए। अच्छे से बैठकर किया गया भोजन अंगों को लगता है।

8. बेमेल : भोजन करते समय इस बात का जरूर ध्यान रखें कि जो भोजन किया जा रहा है, वह कहीं बेमेल भोजन तो नहीं है। जैसे, दही के साथ बैंगन खाना वर्जित है। दूध के साथ नमक, मूली, कच्चा प्याज, पपीता, खीरा और ककड़ी। अचार खट्टे गर्म पदार्थों के साथ ठंडे पदार्थों का सेवन नहीं करना चाहिए।

9. तीखा : भोजन करने के पहले थोड़ा तीखा खाएं या तीखे से ही भोजन की शुरुआत करें। तीखा इसलिए खाते हैं क्योंकि इससे आपका पाचनतंत्र सक्रिय हो जाए। खाने के पहले तीखा और बाद में मीठा खाने की परंपरा है। खाने के बाद मीठा खाने से अम्ल की तीव्रता कम हो जाती है जिससे पेट में जलन या एसिडिटी नहीं होती है।

10. जल : भोजन के आधा घंटे पहले जल का सेवन करना चाहिए। भोजन के बीच में या बाद में जल ग्रहण नहीं करना चाहिए। बहुत आवश्यक हो तो ही एक घूंट पी सकते हो। खाना खाने के एक घंटे के बाद पानी पीना चाहिए।

11. भावना : आयुर्वेद में कहा गया है कि भोजन को उत्तम विधि और उत्तम भाव से खाने से ही वह आपके लिए अमृत सा प्रभाव देता है किंतु यदि आप भोजन को पूर्ण सम्मान देते हुए नहीं खाते हैं तो यह आपके लिए नुकसानदायक सिद्ध होगा।

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