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Bajarang Baan: बजरंग बाण क्या है ? क्या है बजरंग बाण का महत्त्व और चौपाई ?

जीवांजलि धार्मिक डेस्क Published by: कोमल Updated Tue, 18 Jun 2024 06:07 AM IST
सार

Bajarang Baan :बजरंग बाण, भगवान हनुमान जी की महिमा का गुणगान करने वाला एक प्रसिद्ध भजन है। इसकी रचना महाकवि तुलसीदास जी ने संस्कृत भाषा में की थी। बजरंग बाण भगवान हनुमान जी को प्रसन्न करने का एक उत्तम माध्यम माना जाता है।

बजरंग बाण
बजरंग बाण- फोटो : jeevanjali

विस्तार

Bajarang Baan :बजरंग बाण, भगवान हनुमान जी की महिमा का गुणगान करने वाला एक प्रसिद्ध भजन है। इसकी रचना महाकवि तुलसीदास जी ने संस्कृत भाषा में की थी। बजरंग बाण भगवान हनुमान जी को प्रसन्न करने का एक उत्तम माध्यम माना जाता है। बजरंग बाण को रोजाना पढ़ने से भगवान हनुमान जी की कृपा प्राप्त होती है और जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं। बजरंग बाण भक्तों को शक्ति, साहस और आत्मविश्वास प्रदान करता है।
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मंगलवार और शनिवार को बजरंग बाण का पाठ करना विशेष रूप से शुभ माना जाता है।

बजरंग बाण की रचना:


बजरंग बाण 16 चौपाइयों का एक छोटा सा भजन है। इसमें भगवान हनुमान जी के जन्म, उनकी वीरतापूर्ण कथाओं, और उनके भक्तों के प्रति प्रेम का वर्णन है।


अब सवाल ये है की बजरंग बाण का पाठ कैसे करें ?

- बजरंग बाण का पाठ स्नान करके और स्वच्छ वस्त्र पहनकर करना चाहिए।
- भजन करते समय भगवान हनुमान जी की ध्यान करें।
- शुद्ध मन से बजरंग बाण का पाठ करें।

आप को बता दें बजरंग बाण का पाठ करने से भगवान हनुमान जी की कृपा प्राप्त होती है। इससे जीवन में आने वाली बाधाएं दूर होती हैं। भक्तों को शक्ति, साहस और आत्मविश्वास प्राप्त होता है। नकारात्मक शक्तियों से रक्षा होती है। ग्रहों के दोष दूर होते हैं। मानसिक शांति प्राप्त होती है। धन-वैभव और समृद्धि प्राप्त होती है।
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अगर आप भी बजरंग बाण का पाठ करना चाहते हैं तो नीचे सम्पूर्ण बजरंग बाण दोहे सहित लिखा है 
 

बजरंग बाण


||दोहा|| 
निश्चय प्रेम प्रतीति ते, बिनय करैं सनमान। 
तेहि के कारज सकल शुभ, सिद्ध करैं हनुमान॥ 

 ||चौपाई|| 

 जय हनुमंत संत हितकारी। सुन लीजै प्रभु अरज हमारी॥ 
जन के काज बिलंब न कीजै। आतुर दौरि महा सुख दीजै॥ 
जैसे कूदि सिंधु महिपारा। सुरसा बदन पैठि बिस्तारा॥ 
आगे जाय लंकिनी रोका। मारेहु लात गई सुरलोका॥ 
जाय बिभीषन को सुख दीन्हा। सीता निरखि परमपद लीन्हा॥ 
बाग उजारि सिंधु महँ बोरा। अति आतुर जमकातर तोरा॥ 
अक्षय कुमार मारि संहारा। लूम लपेटि लंक को जारा॥ 
लाह समान लंक जरि गई। जय जय धुनि सुरपुर नभ भई॥ 

अब बिलंब केहि कारन स्वामी। कृपा करहु उर अंतरयामी॥ 
जय जय लखन प्रान के दाता। आतुर ह्वै दुख करहु निपाता॥ 

जय हनुमान जयति बल-सागर। सुर-समूह-समरथ भट-नागर॥ 
ॐ हनु हनु हनु हनुमंत हठीले। बैरिहि मारु बज्र की कीले॥ 

ॐ ह्नीं ह्नीं ह्नीं हनुमंत कपीसा। ॐ हुं हुं हुं हनु अरि उर सीसा॥ 
जय अंजनि कुमार बलवंता। शंकरसुवन बीर हनुमंता॥ 

बदन कराल काल-कुल-घालक। राम सहाय सदा प्रतिपालक॥ 
भूत, प्रेत, पिसाच निसाचर। अगिन बेताल काल मारी मर॥ 

इन्हें मारु, तोहि सपथ राम की। राखु नाथ मरजाद नाम की॥ 
सत्य होहु हरि सपथ पाइ कै। राम दूत धरु मारु धाइ कै॥ 

जय जय जय हनुमंत अगाधा। दुख पावत जन केहि अपराधा॥ 
पूजा जप तप नेम अचारा। नहिं जानत कछु दास तुम्हारा॥ 

बन उपबन मग गिरि गृह माहीं। तुम्हरे बल हौं डरपत नाहीं॥ 
जनकसुता हरि दास कहावौ। ताकी सपथ बिलंब न लावौ॥ 

जै जै जै धुनि होत अकासा। सुमिरत होय दुसह दुख नासा॥ 
चरन पकरि, कर जोरि मनावौं। यहि औसर अब केहि गोहरावौं॥ 

उठु, उठु, चलु, तोहि राम दुहाई। पायँ परौं, कर जोरि मनाई॥ 
ॐ चं चं चं चं चपल चलंता। ॐ हनु हनु हनु हनु हनुमंता॥ 

ॐ हं हं हाँक देत कपि चंचल। ॐ सं सं सहमि पराने खल-दल॥ 
अपने जन को तुरत उबारौ। सुमिरत होय आनंद हमारौ॥ 

यह बजरंग-बाण जेहि मारै। ताहि कहौ फिरि कवन उबारै॥ 
पाठ करै बजरंग-बाण की। हनुमत रक्षा करै प्रान की॥ 

यह बजरंग बाण जो जापैं। तासों भूत-प्रेत सब कापैं॥ 
धूप देय जो जपै हमेसा। ताके तन नहिं रहै कलेसा॥ 

 ||दोहा|| 
प्रेम प्रतीतिहिं कपि भजै। सदा धरैं उर ध्यान।। 
'तेहि के कारज तुरत ही, सिद्ध करैं हनुमान।।

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